संयुक्त राष्ट्र  भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति वाले सदस्यों की बुधवार को आलोचना की। वजह थी, आतंकवादियों को सूचीबद्ध करने में बिना किसी स्पष्टीकरण के बाधा उत्पन्न करना। पाकिस्तान के मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की कोशिश में बार-बार अड़ंगा डाल रहे चीन पर भारत का यह परोक्ष हमला था। बता दें कि पाकिस्तानी प्रतिष्ठान से संबंधित आतंकवादियों या अतिवादी समूहों को सूचीबद्ध करने के मामले में चीन ने अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल किया है।

पारदर्शिता पर जोर 

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने सुरक्षा परिषद की कार्य प्रणालियों पर खुली चर्चा में भाग लेते हुए कहा, 'कई बार यह भी नहीं पता होता कि किन देशों ने अपने वीटो का इस्तेमाल किया है। वीटो शक्ति वाले देश बिना कोई स्पष्टीकरण दिए कई आतंकवादियों को सूचीबद्ध करने में बाधा डाल रहे हैं।' उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में यूएन की प्रतिबंध समितियों में पारदर्शिता और जवाबदेही के अलावा उनकी विसंगतियां दूर करने की भी दरकार है। 


चीन ने अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अलकायदा प्रतिबंध समिति के तहत चिह्नित करने की भारत की कोशिश को बार-बार बाधित किया है। 14 प्रतिबंध समितियों ने 678 व्यक्तियों और 385 संस्थाओं को इस प्रकार के प्रतिबंध लगाए जाने के लिए सूचीबद्ध किया है। इसके बावजूद, ये निर्णय जानकारी दिए बिना लिए गए और इस बात का भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि किसके आधार पर यह फैसला लिया गया। 


सुधार की अपील 

अकबरुद्दीन ने कहा, ‘मौजूदा विसंगतियों ने परिषद की कार्यकुशलता और विश्वसनीयता को प्रभावित करने के साथ ही निर्णयों को लागू करने के लिए अनिवार्य सदस्यों की बड़ी संख्या को भी प्रभावित किया है। इसी भावना के तहत कई अन्य देशों के साथ मेरे देश ने सुरक्षा परिषद में सुधार की अपील की है।’ उनके दृष्टिकोण का बोल्विया के प्रतिनिधि ने समर्थन किया जिन्होंने कहा कि प्रतिबंधों की सफलता सभी सदस्य देशों के सहयोग पर निर्भर करती है। 


पाकिस्तान ने फिर छेड़ा 'राग कश्मीर' 

पाकिस्तान ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मुद्दा उठाया। यूएन पर ‘चयनात्मक’ रूप से अपने प्रस्ताव लागू करने का आरोप लगाया। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने इस मामले में सुरक्षा परिषद के दशकों पुराने प्रस्तावों, खास तौर पर काफी समय से लंबित जम्मू-कश्मीर जैसे मामलों पर, आवधिक समीक्षा की मांग की। कश्मीर मुद्दे पर भारत लगातार किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है, जबकि पाकिस्तान ने मतभेद दूर करने के लिए हमेशा मध्यस्थ की मांग की है।