प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपचायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते।। गीता 2/65



प्रसादे, सर्वदु:खानाम्, हानि, अस्य, उपजायते,

प्रसन्नचेतस: हि, आशु, बुद्धि:, पर्यवतिष्ठते।।



भावार्थ: मन शांत और प्रसन्न रहे। जल्दी से परेशान होने का स्वभाव नहीं। मानसिक प्रसन्नता में अनेक प्रकार के दुखों की हानि स्वाभाविक होने लगती है तथा बुद्धि भी स्थिर रहती है। 



अंत: करण की प्रसन्नता होने पर सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति की बुद्धि भी एकनिष्ठ रहती है, जिससे वह प्राय: विचलित नहीं होता। प्रसन्नचित्त स्थिति जीवन की स्वाभाविक ऊर्जा, शांति और बल है। तनाव-दबाव में रहने की आदत मानसिक और शारीरिक रोगों को नियंत्रण है। बात-बात में तनाव को अपने ऊपर हावी होने की अनुमति नहीं दो। 



कई बार तनाव का कारण इतना बड़ा नहीं होता, जितनी बड़ी समस्या तनाव के बाद बन जाती है। कभी-कभी तनाव के कारण ही शरीर अस्वस्थ होने लगता है, थोड़ी-सी अस्वस्थता और अधिक तनाव बन जाती है, जिससे बीमारी बढ़ जाती है। शरीर अस्वस्थ, मन अशांत, बुद्धि भी विचलित। न कहने योग्य बातें, न करने योग्य काम में अधिक ध्यान जाने लगता है जिससे समूचा वातावरण बिगडने लगता है।



श्री गीता जी का यह श्लोक बहुत सीधा और स्पष्ट समाधान है। आप सोच सकते हैं कि शारीरिक अस्वस्थता के चलते मानसिक प्रसन्नता कैसे बनी रह सकती है। नि:संदेह कठिन है लेकिन असंभव नहीं। गीता पाठ करें, भगवान के नाम ध्यान की ओर मन लगाएं, सोच स्वस्थ, सकारात्मक रखें, खुली प्रकृति को निहारें, खुला आकाश, खुला सूर्य प्रकाश, खुली हवाएं-मन के भावों को उनसे जोड़ो, मन को तनावपूर्ण सोच में सिकुडने न दें। खुले मन में स्वाभाविक शांति प्रसन्नता प्रकट होगी, यही सहज प्रसन्नता भगवद् गीता का कृपा प्रसाद है।



औरंगजेब के छोटे भाई दाराशिकोह शरीर की अत्यंत रुग्ण अवस्था में भी हर समय प्रसन्नचित्त दिखाई देते थे। उनसे किसी ने एक दिन वृद्ध एवं रुग्णावस्था में प्रसन्न एवं मुस्कुराते रहने का रहस्य पूछा। उनका सीधा-सा उत्तर था-इस अवस्था में भी मेरी प्रसन्नता केवल भगवद् गीता का ही प्रसाद है।