2 मार्च को पूरे देश में होली का त्यौहार मनाया जाएगा। देश भर में होली का उत्सव बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। लेकिन कान्हा कि नगरी में बसंत पंचमी से ही होली का महोत्सव शुरू हो जाता है। इस वर्ष भी 22 जनवरी से ही यहां होली का महोत्सव शुरू हो गया है। प्रत्येक वर्ष यहां होली का प्रारंभ ब्रज के बाबा वृषभानु के गांव बरसाना से शुरू होती है जो श्रीराधा जी का जन्मस्थली है। यहां कि होली विश्वभर में प्रसिद्ध है। बरसाना के हर शहर में विभिन्न-विभिन्न प्रकार से होली मनाई जाती है। कहीं फूलों की होली तो कई लड्डुओं की होली। तो आईए जानतें है कि मथुरा, वृंदावन आदि में होली क्यों और कैसे मनाई जाती है।



यहां कि सबसे प्रसिद्ध होली, लठ्ठमार होली का माना गया है। यह होली खेलने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और बाॅलीवुड की अभिनेत्री (ड्रीमगर्ल) हेमा मालिनी भी बरसाना में आते हैं। ब्रजवासी अपने इस त्यौहार को मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लठ्ठमार होली न केवल आनंद के लिए बल्कि यह नारी सशक्तीकरण का भी प्रतीक मानी जाती है। 



पौराणिक कारण

मान्यता अनुसार, श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ राधा रानी के साथ होली खेलने के लिए बरसाना में आया करते थे। परंतु राधा रानी अपनी सखीयों के साथ मिलकर बांस के लाठियों से उन्हें मार-मार दौड़ाती थी। तब से ब्रज में लठ्ठमार की परंपरा प्रचिलत हुई। 


कहा जाता है क श्रीकृष्ण महिलाओं का सम्मान करते थे और मुसीबत के समय में हमेशा उनकी रक्षा करते थे, लठ्ठमार होली में श्रीकृष्ण के उसी संदेश को प्रदर्शित किया जाता है। इस होली को खेलते द्वारा महिलाएं थोड़े से चुलबुले अंदाज में लठ्ठमार होली से अपनी ताकत का प्रदर्शन करती हैं।



बरसाना की लठ्ठमार होली के एक दिन पश्चात नंदगांव में होली मनाई जाती हैं। यहां बरसाना के पुरुष नंदगांव की महिलाओं के साथ रंग खेलने पहुंचते हैं, लेकिन महिलाएं बदले के तौर पर उन्हें लाठियों से मारती हैं। होली के पर्व पर कान्हा की इस पूरी नगरी में की हर तरफ फिजाओं में रंग, गुलाल व आनंद उड़ता है। इतना ही नहीं विदेशी भी यहां होली खेलने के लिए आते हैं। 



वृंदावन की होली और बांके बिहारी मंदिर (रंगभरनी एकादशी) 26 फरवरी 2018, सोमवार- हिंदू धर्म के अनुसार रंगभरनी एकादशी खास दिन है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में काफी धूमधाम के साथ रंगभरनी एकादशी मनाई जाती है। दुनिया भर के श्रीकृष्ण भक्त यहां इकठ्ठा होते हैं और रंगों से होली खेलते हैं।

श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में होली (26 फरवरी 2018)- मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर में भी होली का भव्य जश्न मनाया जाता है। क्योंकि यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। दूर-दूर से श्रीकृष्ण भक्त आकर यहां होली खेलते हैं। इस मौके पर लठ्ठमार होली भी खेली जाती है। हर तरफ बस रंग और रंग ही नजर आते हैं। यहां श्रीद्वारकाधीश मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है।



होलिका दहन (1 मार्च 2018, गुरुवार)- होलिका दहन यानी बुराई को खत्म करने का प्रतीकात्मक त्यौहार कहा जाता है। होली में जितना महत्व रंगों का है उतना ही होलिका दहन का भी।



पौराणिक कथाओं के मुताबिक, हिरण्यकश्यप नाम अपने पुत्र प्रहलाद पर अत्यधिक क्रोधित था, क्योंकि वह भगवान विष्णु भक्त था। क्रोधित हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रहलाद को अग्नि में लेकर बैठने को कहा था। क्योंकि उसकी बहन होलिका को अग्नि के प्रभाव से मुक्त होने का वरदान प्राप्त था। लेकिन इसके बावजूद होलिका स्वंय ही अग्नि में भस्म हो गई थी और विष्णु भक्त प्रहलाद पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।



धुलंदी होली (बृज की पानी और रंगों की होली) (2 मार्च 2018, गुरुवार)- इन तमाम जश्नों के बाद रगों की होली का दिन आता है। पूरे ब्रज के लोग होली खेलने के लिए यहां इकठ्ठे होते हैं। जहां हवा में लाल, हरा, नीला, गुलाबी, बैंगनी हर तरह के रंग घुलते हैं, वहीं हर तरफ प्यार, आनंद एवं भाईचारा भी उमड़ दिखाई पड़ता है।