छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में समाज का फरमान एक परिवार पर इतना भारी पड़ गया कि पास रहते हुए भी मौत के बाद पिता को बेटे का कंधा नसीब नही हो सका. बेटा घर में बैठकर रोता बिलखता रहा, लेकिन पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सका. इतना ही नहीं बेटे को पिता का अंतिम दर्शन भी नहीं करने दिया गया. मामला सुपेबेड़ा गांव का है.


किडनी की बीमारी के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सूर्खियों आए सुपेबेड़ा गांव की चर्चा समाज के एक​ तुगलकी फरमान को लेकर भी हो रही है. गांव के गोवर्धन माली द्वारा प्रेम विवाह करने पर समाज ने उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया है. साथ ही उसके परिवार को भी उसके साथ बातचीत नहीं करने की हिदायत दी गयी है. यदि परिवार के सदस्य ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें भी समाज से बहिष्कृत करने की चेचावनी दी गयी है.


समाज के फरमान के बाद गोवर्धन अपनी पत्नी के साथ बाकि परिवार से अलग रहता है.

बीते बुधवार की रात बीती रात गोवर्धन के पिता कुर्तीराम की मौत हो गयी. गोवर्धन समाज के फरमान के कारण अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुआ. गोवर्धन ने अंतिम यात्रा में शामिल होने की इच्छा जाहिर की, लेकिन समाज के लोगों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. 


समाज के लोगों ने चेतावनी दी कि यदि उसने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया तो वे सब वापिस चले जायेंगे. इसलिए गोवर्धन चाहते हुए भी पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पाया. गोवर्धन माली ने बताया कि उसके पिता कुर्तीराम 10 साल से किडनी बीमारी से लड़ रहे थे. मौत उसके आगे पिछे मंडराती रही मगर वह हर बार उसे चकमा देते रहे, लेकिन जब समाज के लोगों ने उसके खिलाफ तुगलकी फरमान सुनाया तो वे सदमें में आ गए. इसके बाद से उसके पिता ने खाना—पीना छोड़ दिया था.