लघुकथा.. दो चोर
गगनचुम्बी उस होटल की छत के एक कोने में स्वीमिंगपुल बना हुआ था बाकी जगह सफेद नीले रंग की टाईल्स पर आरामदेह कुर्सी पसरी थी और उस कुर्सी पर माल्या नामक आदमी पसरा था.. जो हरे रंग की एक बोतल से दूसरी ही समान कुर्सी पर पसरे नीरव की ग्लास में पेग बना रहा था..
"तुमसे तो दोस्त.. "ज्यादा ही" उड़ा कर लाया हूं " नीरव ने चुटकी से सिरगेट की राख को रजनीकान्त स्टाईल में एैश ट्रे में झाड़ते हुए कहा ।
माल्या ढक्कन बंद करते हुए मुस्कुरा रहा था..बोला "शुक्र समझो कि इतना तो छोड़कर आया था.. "तुम्हारे लिए"
इस बार दोनो के ठहाके।
छोड़ी देर की खामोशी के बाद माल्या ( कश खींचते हुए) - फाईनली तेरी जेब में कितना आया... ये बता तू तो..
नीरव - अबे छोड़ भी.. टुकड़ों में बिकने वालों को टुकड़ो में ही खरीदा है मैनें..
नीरव और कुछ बोलता स्वीमिंग पुल में किसी मोटे आदमी के कूदने पर दोनो उधर डारवर्ट हो गये..
चिकन की हड्डियो से भरी प्लेट उठाते हुए वेटर ने पुछ लिया.. "एनीथिंग एल्स सर"..
.... "नो.. नो थेंक्स.."
"भईया जो खाया उसको तो पचा लेने दे"..
हा हा हा... माल्या इन ठहाको के साथ अपनी हरामखोरी से बढ़ी तौंद को, टेबल को आगे सरका कर निकालते हुए स्वींमिंग पुल में कूद जाता है...
चोर नं दो, पेग ज्यादा होने से कुर्सी पर ढल चुका है...