हिंदू संस्कृति की पहचान और आधार हैं उसके संस्कार। इनका बहु विधि अर्थ है अच्छा करना, वस्तु के दोष को दूर करना और उसे नया आकर्षक रूप देना। अर्थात जिस क्रिया के योग से मनुष्य में सदगुणों का विकास व संवर्धन तथा दोषों का निराकरण होता है वह क्रिया है- संस्कार। माननीय संवेदनाओं, अनुभूतियों से जुड़े 16 संस्कारों का उल्लेख गृह्य सूत्र में मिलता है। यह सोलह संस्कार हैं- पुंसवन संस्कार, सीमंतोन्नयन संस्कार, जातकर्म, नामकरण संस्कार, निष्करण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, चौलकर्मसंस्कार, मुंडन संस्कार, विद्यारंभ/पट्टीपूजन संस्कार, उपनयन/यज्ञोपवीत संस्कार व चतुर्वेद अध्ययन संस्कार अथवा गुरुकुल संस्कार/ऋषि कुल व्रत संस्कार केशांत संस्कार, जन्मोत्सव संस्कार, विवाह संस्कार और अंत्येष्टि संस्कार।

इनमें विवाह संस्कार अहम भूमिका अदा करता है। प्रणय सूत्र में बंधने के बाद पति-पत्नी एक दूसरे के सहचरी बन जाते हैं। उनके द्वारा किए गए शुभ-अशुभ कर्मों का फल एक-दूसरे के साथ जुड़ जाता है। पुराणों के अनुसार, पत्नी की ये आदतें पति को नहीं बनने देती धनवान-

जो पत्नी सुबह देर तक सोती रहती है और प्रतिदिन नहाती भी नहीं है, उसका पति सदा अभागा ही रहता है।

घर में स्वच्छता का ध्यान न रखने वाली महिला का पति अभाग्य का संगी बना रहता है। 

कटु स्वभाव वाली, दूसरों को दुखी करने वाली स्त्री पति के दुर्भाग्य को बढ़ाती है।

जरूरत से अधिक पेट पूजा करने वाली महिला के पति का भाग्य हमेशा मंद रहता है।

 

 

 

पुरूष को धनवान नाते हैं पत्नी के ये गुण

भविष्यपुराण में बताया गया है, जो महिला भोर के वक्त बिस्तर छोड़ कर स्नान उपरांत सुंगधित द्रव्य लगा कर श्रृंगार करती है। फिर पूजा-पाठ के बाद घर की साफ-सफाई कर उसे महकाती है। धर्म के मार्ग पर चलती है, ऐसी महिला का पति धनवान होता है और संसार का हर सुख पाता है।