अमावस्या पर सोमवार को महिलाओं ने अपने पति के लंबे उम्र के लिए व्रत रखा। पीपल वृक्ष के नीचे पहुंची महिलाओं ने वृक्ष के चारो तरफ 108 बार परिक्रमा की और हर बार वृक्ष में सूत लपेटते जा रही थीं। हर परिक्रमा के दौरान कोई न कोई वस्तु (मिठाई या फल) वृक्ष की जड़ में चढ़ा रही थीं। परिक्रमा पूरी होने के बाद पूजा-अर्चना कर मंगल कामना की।


मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन स्नान-दान सभी पापों का नाश करता है। इस दिन व्रत रहकर स्नान, दानादि करने से संतान को सुख तथा अक्षय धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है। स्त्रियों को चिरकाल तक सौभाग्य मिलता है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

सोमवती अमावस्या के पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन पीपल वृक्ष के पूजन से जहा महिलाओं के पति दीर्घायु को प्राप्त होते हैं, वहीं इस दिन पीपल के वृक्ष पर तिल और जल अर्पित करने से पितृगण प्रसन्न होते हैं। सोमवती अमावस्या पर्व विभिन्न नदी घाटों पर श्रद्धालुओं के स्नान की व्यवस्था बनाई गई थी। इस बार सोमवती अमावस्या विशेष फलदायक है। इसलिए शनि ग्रह व पितृ बाधा से पीड़ित लोग पीपल वृक्ष के पूजन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति कर सकते हैं। यह अमावस्या साल में लगभग एक ही बार आती है। हिन्दू धर्म में इस अमावस्या का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत (पीपल वृक्ष व्रत) की भी संज्ञा दी गई है। इस दिन विवाहित स्त्रिया पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा करती हैं और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेटकर परिक्त्रमा करती हैं। इस दिन भंवरी देने की भी परंपरा प्राचीन काल से रही है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ पर चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का भी विशेष महत्व है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों की आत्माओं को शाति मिलती है।