वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। पद्मपुराण के अुनुसार, मोहिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है। अर्थात जाने-अनजाने में जो भी पाप हमसे हुए हैं, उनके बुरे फलों से छुटकारा दिलाता है मोहिनी एकादशी का व्रत। सीता माता की खोज के दौरान भगवान श्रीराम ने भी इस व्रत को किया था। साथ ही द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने यह व्रत किया था। 

इस व्रत का लाभ 

इस व्रत को करने से सभी प्रकार के पापों से तो मुक्ति मिलती ही है, साथ ही मनुष्य बेकार के मोह से मुक्त हो जाता है। जीवन में कई प्रकार के मोहजाल होते हैं, मोहिनी एकादशी का यह व्रत उन सभी से मुक्ति दिलाता है। व्रत करनेवाला मनुष्य इस लोक का समय पूरा करने पर बैकुंठ लोक में स्थान पाता है। 


क्या हैं व्रत के नियम? 

पद्मपुराण के अनुसार, एकादश व्रत करनेवाले मनुष्य को उड़द, मसूर, चना, शाक, शहद, दूसरे के अन्न, दो समय का भोजन और यौन संबंधों के भोग से बचना चाहिए। साथ ही व्रतधारी को झूठ नहीं बोलना चाहिए और क्रोध नहीं करना चाहिए। 


व्रत की विधि 


- मोहिनी एकादशी का व्रत करनेवाले व्यक्ति को एक दिन पूर्व अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। 


- व्रत के दिन एकादशी तिथि में व्रतधारी को सूर्योदय से पहले उठना चाहिए और नित्यकर्म के बाद शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान के लिए किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है। 


- स्नान के दौरान कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना चाहिए। स्नान करने के बाद धुले हुए वस्त्र धारण करने चाहिए। 


- इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान श्रीराम की पूजा भी की जाती है। व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरू किया जाता है। संकल्प लेने के लिए इन दोनों देवों के समक्ष हाथ में जल लेकर भगवान से अपने व्रत को सफल बनाने की प्रार्थना करनी चाहिए। 


- देवों का पूजन करने के लिए कलश स्थापना करें, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांधकर पहले कलश का पूजन करें। फिर इसके ऊपर भगवान कि तस्वीर या प्रतिमा रखें। भगवान को स्नान कराकर रोली-अक्षत और वस्त्र अर्पित करें। 


- धूप, दीपक से आरती उतारें और मीठे फलों का भोग लगाएं। सभी में प्रसाद बांटे। 


- रात्रि में भगवान का कीर्तन करने के बाद मूर्ति के समीप ही शयन करना चाहिए। 


व्रत की कथा 

एक समय भगवान श्रीकृष्ण ये युधिष्ठिर से कहा- "हे धर्मराज! मैं आपसे एक कथा कहता हूं, जो महर्षि वशिष्ठ ने श्रीरामचंद्रजी को सुनाई थी। एक समय श्रीराम बोले कि- "हे गुरुदेव! कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे समस्त पाप और दु:ख का नाश हो जाए। मैंने सीताजी के वियोग में बहुत दु:ख भोगे हैं।" महर्षि वशिष्ठ बोले- "हे राम! आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध तथा पवित्र है। यद्यपि आपका नाम स्मरण करने से मनुष्य पवित्र और शुद्ध हो जाता है, तब भी लोकहित में यह प्रश्न अच्छा है। वैशाख मास में जो एकादशी आती है, उसका नाम 'मोहिनी एकादशी' है। इसका व्रत करने से मनुष्य सब पापों तथा दु:खों से छूटकर मोहजाल से मुक्त हो जाता है। मैं इसकी कथा कहता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। 


सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा राज करते थे। उस राज्य में धन-धान्य से संपन्न व पुण्यवान धनपाल नामक वैश्य भी रहता था। वह धर्म का पालन करनेवाला और भगवान विष्णु का भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएं, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे। सड़कों पर आम, जामुन, नीम आदि के अनेक वृक्ष भी लगवाए। उसके पांच पुत्र थे- 'सुमना', 'सद्‍बुद्धि', 'मेधावी', 'सुकृति' और 'धृष्टबुद्धि'। इनमें से पांचवां पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह भगवान और पितर आदि को नहीं मानता था। वह वेश्याओं के साथ रहता था, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता था। उसे मांस-मंदिरा की लत थी। इस प्रकार के अनेक कुकर्मों में वह पिता के धन को नष्ट करता रहता था। एक दिन उसे चौराहे पर एक वेश्या के साथ घूमते देखा गया, इस पर पिता ने उसे घर से निकाल दिया। 


घर से बाहर निकलने के बाद वह अपने गहने-कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब सब कुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख-प्यास से अति दु:खी रहने लगा। कोई सहारा न देख चोरी करना सीख गया। एक बार वह पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया। राजाज्ञा से इस बार उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसे अत्यंत दु:ख दिए गए। बाद में राजा ने उसे नगर से निकल जाने का आदेश दिया। वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहां वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। 


एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुंच गया। उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा में स्नान से लौट रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई। वह कौडिन्य मुनि से हाथ जोड़कर कहने लगा कि- ऋषिवर, मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। आप इन पापों से छूटने का कोई साधारण और सरल उपाय बताएं। उसके वचन सुनकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। इससे समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे। मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक गया। इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य को पढ़ने से अथवा सुनने से एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है।