वाराणसी  छावनी परिषदों को रास्ते खोलने के आदेश के बाद बोर्ड के नियमों में भी संशोधन की कवायद केंद्र सरकार के स्तर पर चल रही है। सरकार अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे नियमों में बदलाव करने की तैयारी में है। आम नागरिकों की तरह छावनी क्षेत्र में रहने वालों को भी सुविधाएं मुहैया कराने की चर्चा शुरू हो गयी है। आजादी के पहले से छावनी में रह रहे ऐसे कई परिवार हैं जिन्हें मरम्मत की अनुमति न मिलने के कारण उनके बंगले खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। ऐसे भवनों को जहां नया जीवन मिलेगा वहीं उसमें रहनेवालों के लिए सबसे बड़ी सौगात होगी। 


बंगला नम्बर दो में अरुण कुमार गुप्ता का परिवार वर्ष 1951 से रह रहा है। अंग्रेजों के जमाने का बने बंगला समय से साथ जर्जर होता गया। अरुण कुमार बताते हैं कि मरम्मत के लिए बोर्ड से इजाजत मांगी जाती रही लेकिन नियम आड़े आते रहे। बोर्ड के सहयोगात्मक रवैये के बावजूद नियमों की बेड़ी लगी रही और आज बंगला खंडहर में तब्दील हो चुका है। ऐसी ही हालत बंगला नम्बर 11 की है। छप्पर से बने इस बंगलों में मो. यासीन का परिवार आजादी से पहले 1944 से रह रहा है। धीरे-धीरे छप्पर टूटने और धरन गिरने लगे। मरम्मत की इजाजत मांगी जाती रही लेकिन बोर्ड के नियम बाधक बने रहे। हालत यह है कि परिवार को इलाहाबाद स्थित आवास पर रखना पड़ा। समय-समय पर वे बंगले में आते हैं लेकिन बारिस और आंधी-तूफान की आशंका होते भागना पड़ता है। ऐसे नियम किस काम के जो वहां रहनेवालों को राहत न दे सकें। सरकार यदि उनके बारे में सोच रही है तो इससे बेहतर हमारे लिए कुछ नहीं हो सकता। हमारे जैसे दर्जनों लोगों के मकान खंडहर होते जा रहे हैं। उन्हें भी राहत मिल सकेगी।