स्वामी अवधेशानन्द गिरि

इच्छापूर्ति करने में मनुष्य का संपूर्ण जीवन नष्ट हो जाता है और वह इसके फंदे में फंसा का फंसा रह जाता है। इस चक्र से बाहर निकलने के लिए मनुष्य को गहराई से चिंतन-मनन करना चाहिए न कि चिंता। कारण कि जीवन के इसी मोड़ पर चिंतन-मनन की काफी आवश्यकता होती है।


आज के भौतिकतावादी समय में इंसान सभी आधुनिक सुख-सुविधाएं जुटाकर अपने जीवन को उन वस्तुओं के आधीन कर स्वयं के सुखी होने की बात करता है और गर्व महसूस करता है। लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति के पास अपने से कुछ अधिक देखकर वह दुखी हो जाता है। दूसरी ओर, जब वह किसी दूसरे से अपने को अधिक देखता है तब उसे अभिमान हो जाता है। यही दीनता और अभिमान उसके जीवन को पतन की ओर गतिशील करते हैं, क्योंकि मनुष्य अपना मूल्य भौतिक शक्ति अर्थात धन-संपत्ति से ही आंकता है। मनुष्य का चंचल मन इन बाह्य वस्तुओं को पाने के लिए सदैव बेचैन रहता है। वह अपनी संपूर्ण शक्ति उन्हीं सुख-सुविधाओं को पाने में लगाता रहता है, लेकिन अंत में ऊर्जा रहित हो जाता है।


शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को अपने मन को नियोजित करना चाहिए और इसके नियोजन के लिए संयम, विचार-मंथन तथा चिंतन की आवश्यकता है। जब हम अपने को नियोजित कर लेंगे तभी हमें ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञान की प्राप्ति होने पर ही मनुष्य अंधकार से प्रकाश की तरफ बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में वह समझेगा कि मैं शरीर नहीं, शरीर में रहने वाली चेतना या आत्मा हूं।


यह आत्मा संजीवनी की तरह शरीर को संवारती रहती है। यदि इस मनोदशा से उबरकर चिंतन करें तो दिशा और दशा दोनों मिलने लगते हैं। सृजन और विनाश सृष्टि का क्रम है। हम इसे रोक नहीं सकते। किंतु इन दोनों के बीच आनंद से रह सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। धन की इच्छा हमें दुख देती है जबकि सुखी होने की खोज हमें दुखी बना देती है। यह अशांति और दुख तब तक नहीं मिटेंगे जब तक हम उनकी खोज में पड़े रहेंगे। यदि यह खोज बंद हो जाए तो जीने की कला आ जाए।


अत: हम दूसरों जैसा बनने की कोशिश छोड़, यह देखें कि हम क्या बन सकते हैं? इसी में हमारी स्वाधीनता है। छोटे-बड़े की तुलना ही अशांति का कारण है। ऐसे में न तो कहीं अशांति रहेगी और न ही दुख रहेगा। आपका जीवन आनंद से भरा-भरा दिखने लगेगा। हमारी अशांति और दुख को कोई और दूर नहीं करेगा। यह हमें ही दूर करना होगा। उसको दूर करने की योग्यता और सामर्थ्य हमारे पास है। हम धनी बन जाएं, यह हमारे वश में नहीं है, किंतु धनी बनने की इच्छा हम छोड़ दें, यह हमारे वश में है। एक दौड़ जारी है। हम किससे आगे हैं और किसके पीछे हैं?