पूर्व काल में दक्ष प्रजापति की दो पुत्रियां कद्रू और विनता मुनिवर कश्यप की पत्नियां थीं। एक दिन खेल-खेल में कद्रू ने अपनी बहन से कहा, ‘‘विनते! सूर्य के रथ में जो उच्चै: श्रवा नामक घोड़ा है उसका रंग कैसा है? हम दोनों शर्त लगाकर इसका निर्णय करें, जो जिससे पराजित हो वह उसकी दासी हो

।’’ विनता ने उत्तर दिया, ‘‘सफेद है।’’ 

कद्रू ने कहा, ‘‘चितकबरा है।’’

कद्रू ने अपने सर्प-पुत्रों को आदेश दिया, ‘‘तुम सब बाल के समान महीन रूप बनाकर उच्चै: श्रवा की पूंछ में लिपट जाओ, जिससे उसके रोएं तुम्हारी विषैली सांसों के प्रभाव से श्याम रंग के हो जाएं।’’

माता के शाप के भय से उनके कुछ पुत्रों ने उसकी खोटी बात मान ली और शुक्ल उच्चै: श्रवा को चितकबरा कर दिया। शर्त के अनुसार विनता ने कद्रू की दासी होना स्वीकार कर लिया। 


एक दिन विनता पुत्र गरुड़ ने अपनी मां को उदास होकर आंसू बहाते हुए देखा। गरुड़ ने पूछा, ‘‘मां! तुम नित्य सवेरे-सवेरे कहां जाती हो और शाम को थकी मांदी कहां से आती हो?’’ 


विनता ने अपने दासी होने का सारा वृत्तांत गरुड़ को बताया। गरुड़ ने विमाता कद्रू और उनके सर्प पुत्रों से पूछा, मेरी माता को दासत्व से मुक्त करने के लिए क्या लेना चाहोगे।सर्पों ने कहा, इन्द्र के लोक स्वर्ग से हमें अमृत लाकर दो और अपनी मां को मुक्त करवा कर ले जाओ।गरुड़ बहुत बलवान थे, वह स्वर्ग लोक गए और वहां से अमृत कलश लाकर उन्होंने अपनी मां को दासता से मुक्त करवाया। अमृत पान से पहले सर्प स्नान करने गए तो देवराज इंद्र अमृत कलश अपने लोक ले गए। जिस स्थान पर कलश रखा था वह कुश का आसन था। सांपों ने सोचा शायद कुश पर कुछ बूंदे अमृत की गिरी हों, ऐसा विचार कर उन्होंने कुश को चाटना आरंभ कर दिया। जिससे सभी की जीभ बीच से फट गई और उसके दो टुकड़े हो गए। कुश पर अमृत की बूंदे गिरने से उसे पवित्र माना जाता है, तभी उसका उपयोग पूजा की सामग्री में होता है।