10 जून को परमा एकादशी है, अधिक मास या पुरुषोत्तम मास में पड़ने के कारण इस एकादशी का काफी धार्मिक महत्व है। इस दिन भक्तिपूर्वक सच्चे भाव से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस एकादशी का सभी एकादशियों से खास महत्व है क्योंकि परमा एकादशी तीन साल में एक बार आती है। यानी 10 जून के बाद अब ये एकादशी 2021 के अधिक मास में आएगी। शास्त्रों में बताया गया है कि जो भी भक्त इस दिन व्रत और पूजा-पाठ करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

एकादशी का महत्व
मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मलमास में इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना व उनका मंत्र जप करता है, उसे भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं। उसके पापों का नाश होता है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। उसके पापों का नाश होता है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस दौरान किए पूजा-पाठ का अन्य माह की अपेक्षा अधिक पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों में दी गई जानकारी के अनुसार, इस एकादशी कथा को पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान के जितना फल प्राप्त होता है। वहीं ब्रह्महत्या, चोरी और सुरापान करने वाले महापापी भी इस व्रत से पापमुक्त हो जाते हैं। इस कारण से यह व्रत बहुत ही पुण्यदायी है।

परमा एकादशी व्रत पूजन विधि
एकादशी के दिन सुबह स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु का ध्यान करके और व्रत करने का संकल्प लें। साथ ही भगवान विष्णु से व्रत के सफलतापूर्वक पूरा होने की प्रार्थना करें। भगवान विष्णु की तस्वीर पर गंगाजल के छींटे देने के बाद रोली-अक्षत से तिलक करें और फूल चढ़ाएं। आज के दिन सफेद फूल से विष्णु पूजन का महत्व है। घी का दीपक जलाकर भगवान से जाने-अनजाने जो भी पाप हुए हैं उससे मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना भी करें। इसके बाद भगवान विष्णु को फलों का भोग लगाएं। समय हो तो सुबह या शाम को मंदिर जाएं। धूप-दीप करें। गरीबों और ब्राह्मणों को आज फलों का दान दें। रातभर भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें।

परमा एकादशी की कथा
परमा एकादशी के बारे में अर्जुन, श्रीकृष्ण से कहते हैं कि आप इस एकादशी की कथा के बारे में जानकारी दीजिए तथा इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? श्रीकृष्ण ने कहा, हे पार्थ! जो भी भक्त सच्चे मन से इस व्रत को करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। आगे अर्जुन को श्रीकृष्ण कथा के बारे में बताते हैं:
प्राचीन काल की बात है काम्पिल्य नगर में सुमोध नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। पिछले जन्म के किसी पाप के कारण वह काफी दरिद्र था। कभी-कभी खाना ना मिलने के कारण भूखे ही सो जाते थे। एक दिन ब्राह्मण अपनी पत्नी से परदेश में काम करने को पूछता है। उसकी पत्नी इसके लिए मना कर देती है। पत्नी ने कहा है, हे प्राणनाथ! आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं, जो भाग्य में होगा वही मिलेगा। उससे ज्यादा ना किसी को मिला है। पत्नी की बात मानकर ब्राह्मण ने फैसला बदल दिया। एक दिन कौण्डिन्य मुनि उस जगह आए। उन्हें सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया और बोले, हे मुनिवर ‘आज हम धन्य हुए। आपके दर्शन मात्र से हमारा जीवन सफल हो गया।

सुमेधा और उसकी पत्नी ने ब्राह्मण का सादर, सत्कार किया और मुनि को भोजन भी करवाया। भोजन के बाद ब्राह्मण की पत्नी बोली, हे मुनिवर! मुझे पूरा विश्वास था कि आप एक दिन यहां जरूर आएंगे। आप हमें दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बताएं। इस इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले, आप दोनों मलमास में पड़ने वाली परमा एकादशी का सच्चे मन से व्रत करो। इस एकादशी के व्रत करने से आपके सभी पाप, दुख और दरिद्रता आदि सभी नष्ट हो जाएं। महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया था। इस व्रत के करने से ब्राह्मण के सभी कष्ट दूर हो गए और वह अपनी पत्नी समेत बिष्णु लोक को गया।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं, हे पार्थ! जो मनुष्य ‘परमा एकादशी’ का व्रत करता है, उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है। जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गाय, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है। इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है।