राजस्थान के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनिवाल की रैलियों ने यहां कांग्रेस की नींद उड़ा दी है. बीते चार साल से किसान आंदोलन का गढ़ रहे सीकर में रविवार को आयोजित हनुमान की हुंकार रैली में भारी भीड़ उमड़ी. इस भीड़ को देख बेनिवाल ने लगे हाथ अपना सियासी मकसद भी साफ कर दिया. इस दौरान उन्होंने राज्य में तीसरे मोर्चे के गठन और राज्य में जाट, मुसलिम, मेघवाल और माली यानी JMMM वोट बैंक को ध्यान में रखकर चुनावी गठजोड़ की बात कही.


बेनिवाल के ये दोनों मकसद कांग्रेस को कुछ सिरदर्द जरूर दे सकते हैं. तीसरे मोर्चे की कवायद से कांग्रेस को सत्ता विरोधी वोट बैंक के बिखरने का डर है. वहीं अगर बेनिवाल के इस तीसरे मोर्चे से बीएसपी, सीपीएम, जमींदारा पार्टी समेत छोटी पार्टियां जुड़ती हैं, तो अपने-अपने इलाके में ये पार्टियां जाट, मुस्लिम और मेघवाल वोट में ही सेंधमारी करेंगी, जो कभी कांग्रेस का मजबूत समर्थक रही हैं. पश्चिम राजस्थान की कम से कम 35 सीटों पर ये जातियां ही जीत-हार का फैसला तय करती रही हैं.


वैसे तो हनुमान बेनिवाल का पहला मकसद खुद को राजस्थान में प्रभावी जाट-किसान नेता के रूप में स्थापित करना है. इसी कारण वह जाट बाहुल्य इलाकों में ही रैलियां कर रहे हैं. उनकी पहली रैली बाड़मेर, दूसरी बीकानेर और तीसरी सीकर में हुई.

दरअसल जाट समुदाय में बीजेपी और कांग्रेस दोनों से ही थोड़ी टीस है. उनकी नाराज़गी की एक वजह ये भी है कि दोनों में किसी पार्टी ने जाट नेता को सीएम उम्मीदवार नहीं बनाया है. यहां मुख्यमंत्री वसुंधराराजे खुद को जाट बहू के रूप में पेश कर रही हैं, लेकिन यहां के जाट सीएम की कुर्सी पर खांटी जाट नेता को देखना चाहते हैं.


ऐसे में समुदाय के लोग हनुमान बेनिवाल में जाट सीएम का सपना देख रहा है. हालांकि परेशानी यह है कि वे न किसी बड़े दल के नेता हैं और न उनका अपना दल ही इतना बड़ा का सियासी गुणा-भाग की स्थिति में किंगमेकर या किंग बन सकें.


इससे पहले जाटों ने ये सपना परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा और शीशराम ओला में भी देखा था. जाटलैंड की सियासत में खाली हुई नेता की कुर्सी पर अब हनुमान आगे बढ़ रहे हैं. फर्क बस ये है कि मदेरणा, मिर्धा और ओला कांग्रेस के जनाधार वाले नेता थे. ऐसे में वोट बैंक को भुना सकते थे.


ऐसे में हनुमान बेनिवाल ने अपनी सियासी ताकत बढ़ाने के लिए तीसरे मोर्चे की कवायद शुरू कर दी है. उनके इस कदम से बीजेपी जहां सत्ता विरोधी वोट में बंटवारे की सोचकर खुश हो रही है. वहीं कांग्रेस को इस फिक्र सता रही है कि जाट बाहुल्य इलाकों में हनुमान और उनका मोर्चा कहीं कांग्रेस की ताकत में सेंध न लगा दे.