पंचायतीराज विभाग में सैंकड़ों कर्मचारी अवैध दस्तावेजों के आधार पर नौकरी कर रहे हैं. स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद कई अभ्यर्थियों ने अवैध दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल कर ली. इतना ही नहीं मामला कई महीनों पहले उजागर हो जाने के बावजूद विभाग कार्रवाई के नाम पर चुप बैठा रहा. अब विभाग ने अपात्र अभ्यर्थियों की नौकरी छीने जाने की कवायद शुरू कर दी है.


पंचायतीराज विभाग द्वारा हाल ही में जारी किये गये एक परिपत्र ने विभाग के कर्मचारियों में खलबली मचा दी है. मामला पंचायतीराज विभाग की एलडीसी भर्ती-2013 से जुड़ा है. विभाग के आयुक्त और शासन सचिव कुंजीलाल मीणा की ओर से जारी परिपत्र के मुताबिक इस भर्ती में कई अभ्यर्थियों को ऐसे विश्वविद्यालयों और संस्थानों से प्राप्त योग्यता प्रमाण पत्रों के आधार पर नियुक्तियां दे दी गई जो विधि मान्य नहीं हैं. अब इन अवैध दस्तावेजों से नियुक्ति पाने वाले सैंकड़ों कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.


दस्तावेजों की फिर से होगी जांच

विभाग नियुक्ति पाये अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की फिर से जांच करवायेगा और जिन कर्मचारियों के दस्तावेज विधि मान्य संस्थान के नहीं हैं उन्हें विधिक प्रक्रिया अपना कर नौकरी से हटाया जायेगा. लेकिन विभाग द्वारा जारी इस परिपत्र ने कई सवाल भी खड़े कर दिये हैं. दरअसल कई अभ्यर्थियों ने अवैध दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां हासिल की है यह जानकारी विभाग को कई महीनों पहले ही लग चुकी थी और मामला उजागर भी हो चुका था. लेकिन विभाग कार्रवाई करने की बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा. जिन अभ्यर्थियों ने अवैध दस्तावेजों से नौकरी हासिल की वे सरकार से वेतन उठाते रहे.जानबूझकर मूंदी गई आंखें

एलडीसी भर्ती के लिये कम्प्यूटर प्रशैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की गई थी. सीएमजे यूनिवर्सिटी से हासिल सर्टिफिकेट पंचायतीराज विभाग की भर्ती में मान्य नहीं होंगे. यह आदेश विभाग की तत्कालीन शासन सचिव और आयुक्त अर्पणा अरोड़ा ने साल 2013 में ही जारी कर दिया था. लेकिन इसके बावजूद एलडीसी भर्ती में इस यूनिवर्सिटी से प्राप्त सर्टिफिकेट के आधार पर कई अभ्यर्थियों को नौकरी दे दी गई.


एक से डेढ़ हजार तक हो सकती है संख्या

एक अनुमान के मुताबिक अवैध दस्तावेजों से नियुक्ति पाये अभ्यर्थियों की संख्या एक से डेढ़ हजार तक हो सकती है. अगर यह आंकड़ा सही है तो अब तक इन्हें वेतन के रुप में 200 से 300 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है. सूत्रों के मुताबिक अवैध दस्तावेजों से नियुक्ति पाये कर्मचारियों की सूची नवम्बर 2017 में ही तैयार की जा चुकी है, लेकिन कार्रवाई करने में देरी की गई है.