सुरक्षित गोस्वामी


मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस: |

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता: || गीता 9/12||


अर्थ: वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं।


व्याख्या: मूढ़ लोग मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते हुए व्यर्थ की आशाओं के बारे में सोचते रहते हैं और चाहते हैं कि वो जो आशा करते हैं वो सब पूरी हो जाएं। उनके सारे कर्म व्यर्थ के होते हैं, जो उनको संसार में फंसाए रखते हैं और अधोगति की ओर ले जाते हैं, साथ ही उनका अर्जित ज्ञान भी व्यर्थ का ही होता है।


उनके ज्ञान में परमात्मा की चर्चा नहीं, बल्कि संसार का राग-द्वेष, काम-क्रोध, लाभ-हानि आदि माया की बातें ही होती है। ऐसे विक्षिप्त चित्त वाले जो अज्ञानीजन हैं वो राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को धारण किये रहते हैं। अर्थात उनमें केवल अपना स्वार्थ, दूसरे का अहित, परमात्मा के प्रति नास्तिकता और मोह का भाव ही पक्का बना रहता है।