मध्य प्रदेश में पिछले साल हुए मंदसौर गोलीकांड में पांच किसानों को गोली मारने वाले पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों को जस्टिस जेके जैन आयोग ने क्लीचचिट दे दी है. नौ महीने देरी से पेश की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्कालीन परिस्थितियों में भीड़ को तितर-बितर करने और पुलिस बल की जीवन रक्षा के लिए गोली चलाना नितांत आवश्यक और न्यायसंगत था. आयोग ने गोलीकांड में निलंबित हुए कलेक्टर स्वतंत्र कुमार और एसपी ओपी त्रिपाठी को भी सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया है.

मंदसौर गोलीकांड की जांच के लिए बने जस्टिस जेके जैन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. हालांकि आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन महिने में सौंपनी थी लेकिन इसका कार्यकाल चार बार बढ़ाया गया था. रिपोर्ट में पुलिस सीआरपीएफ और जिला कलेक्टर और एसपी को क्लीनचिट दे दी गई है.

रिपोर्ट में केवल इतना भर लिखा है कि पुलिस और जिला प्रशासन का सूचना तंत्र कमजोर और आपसी सामंजस्य न होने के कारण आंदोलन उग्र हुआ किसान और अफसरों के बीच संवादहीनता के कारण जिला प्रशासन को उनकी मांगों और समस्याओं की जानकारी नहीं थी. और उन्हें जानने का प्रयास भी नहीं किया गया.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि गोली चलाने में पुलिस ने नियमों का पालन नहीं किया, पहले पांव पर गोली चलाना चाहिए थी, लेकिन इसका ध्यान नहीं रखा गया आयोग ने मुख्य सचिव को बंद लिफाफे में ये रिपोर्ट सौंपी है. जबकि ये रिपोर्ट 11 सितंबर 2017 को सरकार को सौंपी जानी थी. सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रभांशु कमल ने इस रिपोर्ट पर कार्रवाई के लिए गृह विभाग के प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव को दो दिन पहले ही ये रिपोर्ट दी है.जैन आयोग की जांच रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु

- सीआरपीएफ की गोलियों से 2 किसानों की मौत और 3 घायल

- पुलिस की गोलियों से 3 किसानों की मौत और 3 घायल

- सीआरपीएफ और पुलिस का गोली चलाना न तो अन्याय पूर्ण है न ही बदले की भावना से उठाया गया कदम

- मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने के बाद ही थाना पिपल्याहाना थाना प्रभारी ने पहले लाठीचार्ज बाद में गोली चलाने के आदेश दिए.

- बही पाश्र्वनाथ फाटे पर कोई भी किसान नेता मौजूद नहीं था, ऐसी स्थिति में पूरा आंदोलन असामाजिक तत्वों के नियंत्रण में आ गया था.

- जिला प्रशासन ने घटना के पूर्व जो कदम उठाए वो पर्याप्त नहीं थे.

- किसानों और अधिकारियों के बीच संवादहीनता के कारण किसानों की मांग और समस्याओं की जानकारी नहीं थी, इसे जानने का प्रयास भी नहीं किया

- जिला प्रशासन का सूचना तंत्र कमजोर था. मंदसौर मुख्यालय से 13 किमी दूर साढ़े दस बजे चक्काजाम किया, सूचना 2 घंटे बाद साढ़े बारह बजे मिली.

- 5 जून को आंदोलनकारियों ने कई घरों में तोड़-फोड़ कर आगजनी की थी, आंदोलनकारियों पर तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की जाना चाहिए थी जो कि नहीं की गई. जिला प्रशासन ने स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया.

- 5 जून की घटना को देखते हुए प्रशासन ने पर्याप्त मात्रा में अग्निशामक उपाय नहीं किए

- आंदोलन के पूर्व जिला पुलिस ने भी असामाजिक तत्वों को पकडऩे में रुचि नहीं दिखाई

- कलेक्टर ने एसपी को ओदश दिया था कि पुलिस बल के साथ कार्यपालक मजिस्ट्रेट और वीडियोग्राफर को भेजा जाए, लेकिन सीएसपी थोटा के साथ न तो मजिस्ट्रेट भेजा न ही वीडियोग्राफर

- जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन में सामंजस्य नहीं दिखा, सीएसपी थोटा ने गोली चलने की तत्काल समय पर सूचना दी होती तो शायद पुलिस थाने की दूसरी गोली चलने की घटना को रोका जा सकता था.

- अप्रशिक्षित पुलिस बल से भीड़ को तितर-बितर करने आंसू गैस के गोले चलवाए गए जो असफल साबित हुए.

- घटना के महत्वपूर्ण साक्ष्य सीआरपीएफ के अधिकारियों और जवानों की जली हुई वर्दी, जूते और रायफलें घटना के 13 दिन बाद जब्त किए गए

- आयोग ने घटना के 100 दिन बाद अपनी कार्रवाई शुरू की और 211 गवाहों के बयान लिए जिनमें 185 आम जनता से थे और 26 सरकारी गवाह थे

- आयोग के समक्ष सरकारी गवाहों का प्रतिपरीक्षण वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद मोहन माथुर ने किया था. 20 सितंबर को आयोग ने अपना काम शुरू करते हुए पहला बयान दर्ज किया.

- अंतिम गवाह के रूप में 2 अप्रैल 2018 को तत्कालीन मंदसौर कलेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह के बयान दर्ज किए गएइन दोनों स्थानों पर हुए गोली चालन में बबलू जगदीश पाटीदार उम्र 25 साल टकरावद जिला मंदसौर, कन्हैयालाल धुरीलाल पाटीदार उम्र 38 साल चिल्लोद पिपलिया जिला मंदसौर, चेनराम गणपतलाल पाटीदार उम्र 22 साल नया खेड़ा जिला नीमच, अभिषेक दिनेश पाटीदार उम्र 25 साल बरखेड़ा जिला मंदसौर, सत्यनारायण मांगीलाल गायरी लोद जिला मंदसौर की मृत्यु हो गई थी. सरकार ने इन सभी को 1-1 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया था.