हर साल ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी व्रत व पूजन पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। शास्त्रों में इस व्रत का काफी महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस एक व्रत को करने से आपको सभी एकादशी व्रत का पून्य प्राप्त हो जाता है। इस बार निर्जला एकादशी व्रत 23 जून को मनाया जाएगा। चलिए, जानते हैं क्यों इस व्रत का है इतना महत्व और क्या हैं इसकी पूजन-विधि…

इन चीजों का करें दान

शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत भगवान विष्णु को सबसे प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भक्तों को स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद भगवान विष्णु की सच्चे मन से नियमपूर्वक पूजा-अर्चना करने के बाद यथाशक्ति जल का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा ऐसी मान्यता है कि गर्मी के मौसम में काम आनेवाली वस्तुएं जैसे वस्त्र, जूता, छाता, फल आदि दान करने के साथ ही पूरे दिन भगवान विष्णु के मंत्र को भजना चाहिए।

सभी पापों से मिलती मुक्ति

ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से आपको सभी प्रकार के सांसारिक पापों से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु को प्रिय होने के कारण इस व्रत को करने से पालनहार विष्णु की कृपा से मनुष्य का मृत्यु-पर्यन्त स्वर्ग जाने का मार्ग भी प्रशस्त होता है। इसी कारण शास्त्रों में सालभर पड़नेवाली 24-26 एकादशियों में से निर्जला एकादशी का इतना महत्व बताया गया है। इस कारण भक्तगण शुभ फल-प्राप्ति के लिए पूर्णतः जल त्याग कर इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करते हैं।

क्या है पौराणिक कथा

शास्त्रों में इस व्रत को लेकर एक कथा वर्णित है। दरअसल एक बार महर्षि व्यास से भीम ने सभी एकादशी व्रत के बदले ऐसा व्रत रखने की कामना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो। इस पर महर्षि ने उन्हें निर्जला एकादशी व्रत के बारे में बताते हुए कहा था कि यह ऐसा व्रत है कि जिसको करने से साल के समस्त एकादशी व्रत का फल प्राप्त होने के साथ ही, यशस्वी बनने के साथ ही स्वर्ग गमन की कामना पूर्ण होती है। इसी कारण कई जगह इसे ‘भीमसेन एकादशी’ व्रत भी कहा जाता है।

इन बातों का रखें ध्यान

शास्त्र के अनुसार, इस व्रत के नियम ऐसे तो काफी जटिल नहीं है, मगर सुबह-शाम भगवान विष्णु की पूजा अनिवार्य बताई गई है। इसके अलावा पूरा दिन गरीब और जरूरतमंदों लोगों में दान करने का नियम भी बताया गया है। इस दिन कई लोग शिविर लगाकर शरबत आदि पेयजल भी बांटते नजर आते हैं, क्योंकि इस दिन जल से भरे कलश का दान अनिवार्य होता है। पूजा के अगले दिन फिर स्नान आदि करने के बाद ही पूजन के पश्चात व्रत खोलना चाहिए।

फलदायी व्रत का महत्व

ऐसा कहा जाता है कि सर्वप्रथम यह व्रत देवर्षि नारद द्वारा रखा गया था। वहीं चक्रवर्ती राजा अंबरीष के कारण यह व्रत देवलोक के साथ ही समस्त लोकों में प्रसिद्ध हुआ। वह भगवान विष्णु के परमभक्त थे। ऐसे ग्रीष्म ऋतु की घोर तपते दिनों में आनेवाले इस निर्जल व्रत को काफी कठिन भी माना जाता है। शास्त्र के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से ही व्रत प्रारंभ हो जाता है। इसे सभी तीर्थों में स्नान करने के समान फलदायी माना गया है। एकादशी दो प्रकार की होती है- विद्धा (दशमी तिथि होने पर) और शुद्धा (दशमी रहित)। मगर इस व्रत के लिए दशमी से युक्त एकादशी होने पर व्रत करने का निषेध बताया गय़ा है।