प्राचीन समय में एक बहुत ही दरिद्र शूद्र था। उसके कोई घर-परिवार नहीं था न उसका कोई ठिकाना था। वह भूखा-प्यासा हर समय भटकता रहता था। एेसे भटकते हुए एक दिन उसे एक सरोवर के मध्य से एक विशाल शिवलिंग दिखाई पड़ा। सरोवर में कमल पुष्प भरे हुए थे। शूद्र ने उस सरोवर में स्नान किया, जल पीया और कमल पुष्पों के द्वारा उसने शिवलिंग की पूजा की। कई दिनों की भूख के पश्चात उसने सरोवर के जल से ही अपनी भूख मिटाई। वहां से कुछ आगे चलने पर उसकी मृत्यु हो गई। 

मृत्यु का अंतिम काल मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। मरते समय की मूर्छा से पहले के पलों में इंसान जो कुछ करता है, उसी के अनुसार उसे गति प्राप्त होती है। शूद्र ने अंतिम समय में शिवलिंग का पूजन किया था। सरोवर से चलने पर भी उसे उस लिंग की याद आती थी। इसलिए दूसरे जन्म में उसने ब्राह्मण के घर में जन्म लिया। इस जन्म में उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति बनी रही। बाल्यकाल में ही उसमें विवेक जागृत हो गया। वह सोचता था, सत्य के समान प्रतीत होने वाला यह संसार सचमुच मिथ्या है, दुखमय है। अविद्या से ही जीव इसे सत्य मानकर इसमें अासक्त हो गया है। 

इसके पिता ने भगवान शंकर की अाराधना करके बुढ़ापे में यह पुत्र पाया था। फलतः पुत्र में पिता का मोह था, लेकिन यह जातिस्मर बालक अपने को गूंगा दिखलाता था। पिता ने बहुत उपचार कराया। मंत्र-तंत्र का प्रयोग किया, लेकिन रोग अच्छा हुआ नहीं। जो जान-बूझकर गूंगा बना है उसको मंत्र-तंत्र अथवा औषधि कैसे अच्छा कर सकते थे। युवा होने पर यह बालक रात में चुपचाप उठ करके घर से बाहर चला जाता था। उसने कमल पुष्पों से भरा एक सरोवर ढूंढ लिया था। वहां कमल लेकर वह रात में शिवलिंगार्चन करता और लौटकर सो जाता। अपनी अाराधना उसने सभी से छिपा रखी थी। 


काल तो किसी की प्रतीक्षा करता नहीं। पिता की समय पर मृत्यु हो गई। सगे संबंधियों ने गूंगा समझकर इस ब्राह्मण युवक को त्याग दिया। इससे इसको बहुत प्रसन्नता हुई। केवल फल और पत्ते अथवा कमल, बीज, कंद या दूर्वाकुर इसके आहार थे। एक ही व्यसन था- कमलपुष्पों को एकत्र करना और उनसे लिंगार्चन करना। जितने अधिक पुष्प पाए जा सकें, वह यही प्रयत्न करता था। बहुत दिनों तक वह दिनभर और रात्रि में भी शिवार्चन करता रहा। इसकी पूजा से प्रसन्न होकर जब भगवान शंकर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा, तब इसने मांगा-प्रभो! ज़रा और मृत्यु से मुझे मुक्त कर दीजिए। 



शंकर ने कहा जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती ही है। जन्म धारण करने वाला काल से रहित होकर अजर- अमर नहीं हो सकता। अतः तुम अपने जीवन को कोई सीमा निश्चित करो। 


कुछ क्षण गंभीर रहने के पश्चात उस ब्राह्मण युवक ने मांगा- प्रत्येक कल्प के अंत में इस शरीर का एक रोम टूटकर गिर जाए। जब मेरे सब रोम गिर जाएं, तब मेरी मृत्यु हो। मृत्यु के पश्चात आपका सान्निध्य आपका गण होकर प्राप्त करूं। 



उस सम्पूर्ण शरीर में बड़े-बड़े रोम थे। भगवान शंकर हंसे। उन्होंने एवमस्तु कह दिया। दिव्य शरीर प्राप्त होने से पहले बड़े रोम होने के कारण पहले भी लोग उसे लोमश कहते थे। उसका एक शरीर दिव्य हो गया। एवमस्तु कहकर भगवान शंकर अदृश्य हो गए। लोमश को इच्छानुसार कहीं भी जाने की शक्ति प्राप्त हो गई। जब कल्प का अंत होता है, अर्थात ब्रह्मा का एक दिन व्यतीत होता है, लोमश के बाएं घुटने के ऊपर का एक रोम गिर पड़ता है। कहते हैं अब तक उनके बाएं घुटने के मध्य का भाग ही रोम रहित हुआ है।