कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था। वह हर किसी का जितना भी सामान मिलता चुरा लेता था। उसे बिल्कुल भी दया नहीं आती थी की जिसका भी वो सामान है उसको कितना दुख होगा। वह चुराए हुए धन को राज्य के सिपाहियों के डर से जंगल में ज़मीन के अंदर छुपा देता था।

एक रात विरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली और चोर के जाने के बाद जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की तरह ढक दिया। लकड़हारा बहुत चालाकी से सामान निकालता था। चोर को इस चोरी का पता नहीं चल पता था। एक दिन लकड़हारा अपना पत्नी को धन देते हुए बोला तुम रोज धन मांगा करती थी लो आज मेरे पास प्रयप्त धन हो गया है। उसकी पत्नी ने कहा जो धन अपनी मेहनत का नहीं होता वो ज्यादा देर नहीं रहता। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिए। विरदत्त को भी ये बात जच गई। 

उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया। जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था। इसमें सीढ़िया लगनी रह गई थी और सारे पैसे समाप्त हो गए थे। तो वह छिपकर फिर चोर का पीछा करने लगा और देखने लगा वह धन कहा-कहा छुपाता है। इसके बाद फिर उससे दसवां हिस्सा निकाल के तालाब का काम पूरा करवाया और उसने भगवान शंकर और भगवान विष्णु के शानदार मंदिर बनवाए। जंगल कटवा के खेत बनाए और ब्राह्मणों में बांट दिया। ब्राह्मणों ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम द्विज वर्मा रखा।


जब द्विजवर्मा की मृत्यु हुई तब एक तरफ़ से यमदूत आए और एक तरफ़ से भगवान शंकर और विष्णु जी के दूत। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा। इसी बीच वहां नारद जी पधारे और उन्होंने उनको समझाया आप झगड़ा न करें इस लकड़हारे ने चोरी के धन से मंदिर आदि का निर्माण करवाया। अतः जब तक मार्ग से कमाया हुआ धन का प्रायश्चित नहीं कर लेता तब तक वायु रूप में आकाश में विचरण करता रहे। नारद जी की बात सुनकर सभी दूत वापस लौट गए। द्विजवर्मा बारह वर्षों तक प्रेत बनकर घूमता रहा।

नारद जी ने लकड़हारे की पत्नी से कहा तुम ने अपने पति को सदमार्ग दिखाया इसलिए तुम ब्रह्मलोक जाओ। लेकिन लकड़हारे की पत्नी अपने पति के दुःख से दुखी थी। वह देवर्षि से बोली -'जब तक मेरे पति को देह नहीं मिलती तबतक मैं यही रहूंगी। जो गति मेरे पति की हुई वही गति मैं भी चाहती हूं।'


ये बातें सुनकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया कि तुम अपने पति की मुक्ति के लिए शिव की आराधना करो। यह सुनने के पश्चात उसने अपने पति के लिए शिव की आराधना बहुत लगन से की। इससे उसके पति के चोरी का सारा पाप धूल गया। फिर दोनों पति-पत्नी को उत्तम लोक मिला। वज्र चोर तथा कांची के सभी धनी जिनका धन इस कार्य में लगा था सपरिवार स्वर्ग चले गए।