बिलासपुर। किसान पिता ने जीवन के कड़े संघर्ष को बेटी के सपनों के आगे नहीं आने दिया। नेशनल के बाद जब इंटरनेशनल लेवल तक जाने की आई, तब भी उन्होंने बेटी के हौसलों को पंख दिया और आर्थिक तंगी आड़े नहीं आने दी। कर्ज लेकर बेटी को इंटरनेशनल खिलाड़ी बनाया। बेटी ने भी मात्र तीन साल की मेहनत से नेशनल में मिले रजत की चमक को इंटरनेशनल में सोने की चमक में बदल दिया।


जयरामनगर के पास भिलाई की रहने वाली भावना पटेल ने तीन साल पहले ही बेसबॉल और सॉफ्ट बेसबॉल खेलना शुरू किया। दोनों ही खेल में उसे रजत पदक मिला। इससे खेल में रुचि भी बढ़ने लगी। भावना ने थाईलैंड में हुए पहले सॉफ्ट बेसबॉल के इंटरनेशनल टूर्नामेंट में देश का प्रतिधित्व करते हुए अपने पहले ही इंटरनेशनल मुकाबले में गोल्ड मेडल जीता।


भावना ने बताया कि उनके पिता लखन पटेल किसान हैं और मां धनेश्वरी गृहणी हैं। पिता ने हमेशा ही आगे खेलने का हौसला दिया। परिस्थितियां कैसी भी रही हो, लेकिन मुझे बेहतर खेलने को प्रेरित किया।


इसकी वजह से थाईलैंड में हुए अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट का हिस्सा बन सकी और पहला अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेरे पिता के लिए मेरी ओर से उपहार था। भावना के पिता का कहना है कि बेटी जब तक खेलेगी और जहां भी खेल के लिए जाना चाहेगी हर जगह भेजेंगे।


रोज मैदान तक पहुंचने का रहता है संघर्ष


भावना को रोज मैदान तक आने का संघर्ष रहता है। वह ट्रेन से जयरामनगर के पास के अपने गांव भिलाई से सफर शुरू करती है। ट्रेन से बिलासपुर आती है। उसके बाद बस स्टैंड तक पहुंचती है। बस स्टैंड से छत्तीसगढ़ स्कूल मैदान तक की यात्रा पैदल होती है। उसका कहना है कि घर से मिले सहयोग और खेल में ही अलग पहचान बनाने की चाह में सफर आसान लगता है। वहीं सफर की सारी थकान मैदान पहुंचते ही खत्म हो जाती है।


दादा की रहती है तैयारी


भावना के दादा की भी पूरी तैयारी रहती है। भावना ने बताया कि मेरे दादा बुजुर्ग होने के नाते ज्यादा शारीरिक श्रम तो नहीं कर पाते हैं और खेल को भी ज्यादा नहीं समझते हैं। इसके बाद भी प्रतिदिन ट्रेन का समय होने पर वे उसे तैयार करते हैं। मेरी तैयारी से पहले ही उनकी तैयारी रहती है। मेडल देखकर मुझसे ज्यादा वे खुश होते हैं।


कोच रहे हमेशा से आदर्श


भावना के कोच अख्तर खान हमेशा ही उसके लिए आदर्श रहे हैं। अख्तर खान को वर्ष 2010 में शहीद पंकज विक्रम पुरस्कार मिला और इसकी जानकारी स्थानीय स्तर पर छपने वाली स्कूल की जीके किताब से मिली। इसे पढ़कर वह भी खेल में अपना कॅरियर बनाने का सपना देखने लगी और अख्तर खान के मार्गदर्शन में खेल की बारीकियां भी सीखना शुरू किया।