शास्त्रों के अनुसार, हर वर्ष में 24 एकादशी पड़ती है, जिनमें से आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़नेवाली एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना गया है। इस साल यह एकादशी व्रत 9 जुलाई को है। इस व्रत को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति प्रदान कर सुख देने वाला माना गया है।

शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत को करने से एक रात्रि पहले से ही इसके नियमों का पालना करना होता है। दरअसल यह व्रत दशमी तिथि की रात्रि से लेकर द्वादशी तिथि की सुबह दान कर्म करने के साथ समाप्त होता है। जिसके लिए दशमी तिथि से ही व्रती को तामसिक भोजन से परहेज रखना चाहिए। पुराणों में इस व्रत का विशेष महत्व इसलिए बताया गया है कि इस व्रत तक भगवान विष्णु जागृत रहते हैं। इसके बाद देवशयनी एकादशी आती है जिसमें भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन में चले जाते हैं।

इस पूजा के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि नित्यकर्म करने के पश्चात व्रत का संकल्प लेने का विधान है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस दिन तिल के उबटन का लेप करके स्नान करना बहुत ही शुभ रहता है। इस व्रत में भगवान विष्णु और पीपल की पूजा करने का शास्त्रों में विधान है।

पद्मपुराण में योगिनी एकादशी की कथा इस प्रकार बताई गई है। धनाध्यक्ष कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। हर दिन भगवान शिव की पूजा के लिए इन्होंने हेम नाम के माली को पुष्प चुनकर लाने का काम सौंपा था। एक दिन काम के वशीभूत होकर हेम अपनी पत्नी संग विहार करने लगता है और पुष्प समय से नहीं पहुंचा पाता है। इससे क्रोधित होकर कुबेर महाराज सैनिकों को हेम माली के घर भेजते हैं।

सैनिक लौटकर कुबेर को बताते हैं कि काम पीड़ित होकर हेम ने सेवा के नियमों का पालन नहीं किया तो कुबेर को क्रोध और बढ गया। राजा कुबेर ने हेम को शाप दिया कि वह कुष्ट रोग से पीडि़त होकर पत्नी संग धरती पर चला जाए। कुबेर के शाप से हेम को अलकापुरी से पृथ्वी पर आना पड़ा। यहां एक बार ऋषि मार्कण्डेय ने हेम के दुख का कारण जानकर योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत से हेम शाप मुक्त हो गया और पत्नी के संग सुख पूर्वक रहने लगा।