बहुत पहले की बात है – तब गिलहरी काली और बदसूरत हुआ करती थी। लोग भी उसे पसंद नहीं करते थे। वह घरों में पहुंच जाती तो लोग उसे भगाने लगते। निराश गिलहरी गांव में एक साधु बाबा के पास रहने लगी। जो बाबा खाते, वह गिलहरी खाती। उनके यज्ञ की साक्षी बनती और पुण्य का लाभ उठाती। धीरे धीरे गिलहरी बीज, कंद और मूल खाने वाली साध्वी बन गई। कुछ समय बाद बाबा रामेश्वरम की तीर्थयात्रा पर निकले तो गिलहरी भी उनके साथ हो ली। रामेश्वरम के समुद्र तट पर बाबा ने जहां डेरा डाला वहीं किसी पेड़ पर गिलहरी ने भी अपना घर बना लिया। रामेश्वरम में थोड़ा ही समय बीता था कि राम वानरों की अपनी सेना के साथ वहां आ पहुंचे। राम जी ने समुद्र में सेतु निर्माण का कार्य प्रारंभ कर दिया।


नल और नील के नेतृत्व में बंदर और भालू समुद्र में पत्थर डालकर सेतु बनाने लगे। यह देखकर गिलहरी भी रेत के कण उठाकर समुद्र में डालने लगी। यह छोटा सा काम था लेकिन बड़े निर्माण में छोटे से छोटे काम का महत्व होता है, यह समझकर नल-नील ने उसे टोका नहीं और वह अपना काम करती रही। भगवान राम भी उसे चुपचाप काम करते देखते। जिस दिन पुल का निर्माण पूरा हुआ, उस दिन गिलहरी के उत्तरदायित्व, लगन और श्रम को पुरस्कृत करने के लिए भगवान राम ने उसे अपने हाथों में उठाया और आशीर्वाद से भरी अपनी उंगलियों को उस पर फेरा। राम का हाथ लगते ही गिलहरी अत्यंत सुंदर दिखने लगी। कहते हैं तभी से गिलहरी की गणना सुंदर प्राणियों में होने लगी। गांव से भी उसे कोई नहीं भगाता और लोग उससे खूब प्रेम करते। अंत में जब सेतु निर्माण का इतिहास लिखा गया तब हर कवि और रचनाकार ने उस नन्हीं गिलहरी का उल्लेख अपनी रचना में किया।