राजा भोज के समय की बात है। एक गरीब ब्राह्मण अपनी मां व पत्नी के साथ एक झोपड़ी में रहता था। भिक्षा मांगकर गुजारा होता था। एक दिन भिक्षा में कुछ नहीं मिला। पत्नी को पता चला तो वह नाराज हो गई। कलह हो गई और ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पीट दिया। राजा के पास शिकायत पहुंची। राजा ने उस गरीब ब्राह्मण को बुलाया और अपने कोष के भंडारी से ब्राह्मण को सौ मोहरें देने को कहा। राजा की आज्ञा सुनकर भंडारी ने आश्चर्य से कहा, ‘इस ब्राह्मण ने अपराध किया है। अपनी स्त्री को मारा-पीटा है और आप अपराध की सजा न देकर इनाम दे रहे हैं?


इस प्रकार तो राज्य में स्त्रियों पर घोर संकट आ पड़ेगा। लोग अपनी-अपनी स्त्री को पीटकर इनाम लेने के लिए आ खड़े होंगे।’ इस पर राजा ने कहा, ‘जो आदमी खाता-पीता है, सुखी है, वह अगर अपनी स्त्री को पीटे तो उसे जरूर कठोर दंड मिलेगा। दंड और कानून अन्याय और अत्याचार रोकने के लिए है, बढ़ाने के लिए नहीं। इस व्यक्ति का दुख दूसरा है। उस दुख को दूर करने के लिए ही मोहरें दे रहा हूं।


राजा ने कहा कि यदि इस ब्राह्मण को कैद कर दिया जाए तो इसका परिवार तितर-बितर हो जाएगा। दंड देने से अपराध का जो मूल कारण है, वह दूर नहीं होगा। इसके अपराध का कारण दरिद्रता है। मैंने मोहरें देकर दरिद्रता को ही दंडित किया है। मेरी समझ में राजा का यही धर्म है। राजा को अपराध के मूल कारणों पर विचार करना चाहिए और जिन कारणों से लोग अपराध में प्रवृत्त होते हैं, उनका निवारण करना चाहिए। रोग का ऊपरी इलाज पर्याप्त नहीं है, रोग के कारणों को दूर करना महत्वपूर्ण है।’ भंडारी को अब राजा की दूरदर्शिता समझ में आ गई थी। उसने राजा के आदेशानुसार सौ मोहरें खुशी-खुशी ब्राह्मण को दे दीं।