नई दिल्ली, आज बटुकेश्वर दत्त की पुण्यतिथि है। बटुकेश्वर दत्त वही हैं जिन्होंने भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई की थी। बटुकेश्वर दत्त ने 1929 में अपने साथी भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेंट्रेल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में इंकलाब जिंदाबाद के नारों के साथ बम फेंका था। पंजाब के हुसैनीवाला में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ जो  समाधि है वो बटुकेश्वर दत्त की ही है। आइए जानते हैं इनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ अनकही बातें...


बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर 1910 को तत्कालीन बंगाल में बर्दवान जिले के ओरी गांव में हुआ था। साल 1924 में बटुकेश्वर जब कानपुर से अपनी कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे तभी उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई थी। भगत सिंह से प्रभावित होकर बटुकेश्वर दत्त उनके क्रांतिकारी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने बम बनाना भी सीखा। क्रांतिकारियों द्वारा आगरा में एक बम फैक्ट्री भी बनाई गई थी जिसमें बटुकेश्वर दत्त की अहम भूमिका थी।

8 अप्रेल 1929 तत्कालीन ब्रितानी संसद में पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था। इसका मकसद था स्वतंत्रता सेनानियों पर नकेल कसने के लिए पुलिस को ज्यादा अधिकार देना। इसका विरोध करने के लिए बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के साथ मिलकर संसद में फेंक दिया। ये धमाके ध्यान खींचने के लिए किए गए थे, जिनके साथ अपने विचार रखते पर्चे भी फेंके गए थे। इस विरोध के कारण यह बिल सिर्फ एक वोट से पारित नहीं हो सका। ये दोनों ही क्रांतिकारी वहां से भागे नहीं और अपनी इच्छा से गिरफ्तार हो गए।

इसके बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा मिली। फांसी की सजा ना मिलने से वे काफी दुखी हो गए और खुद के लिए काफी अपमानित महसूस कर रहे थे। बताया जाता है कि यह बात पता चलने पर भगत सिंह ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी थी। जिसमें उन्होंने लिखा था कि वो दुनिया को दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जिंदा रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में रहकर अत्याचार भी सह सकते हैं। 


भगत सिंह की बात मानते हुए भगत सिंह ने यही किया और काला पानी की सजा के तहत अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया। साल 1937 में वे बांकीपुर सेंट्रेल जेल पटना लाए गए। 1938 में उनकी रिहाई हो गई। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया. चार साल बाद 1945 में वे रिहा हो गए।


1947 में देश आजाद हो गया. नवम्बर, 1947 में बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर ली और पटना में रहने लगे। लेकिन उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा। वे कई बार बीमार पड़ चुके थे। बटुकेश्वर दत्त को साल 1964 में पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बाकी हैं। इस दौरान बटुकेश्वर दत्त ने पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन से मिलकर अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की। मुख्यमंत्री से रोते हुए उन्होंने कहा था कि मेरी अंतिम इच्छा ये है कि उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधी के बगल में किया जाए। उनकी हालात धीरे-धीरे बिगड़ती गई और 17 जुलाई को वे कोमा में चले गए। 20 जुलाई 1965 को रात 1 बजकर 50 मिनट पर उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। बटुकेश्वर की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।