दिल्ली : अपने पहले इम्तहान में धमाकेदार प्रदर्शन करने वाली आम आदमी पार्टी ने सभी को हैरानी में डाल दिया है। लेकिन इसके बावजूद वह जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। इसकी वजहों की समीक्षा जारी है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों के आपस में मेल खाते चुनाव चिन्ह, अं‌तिम पलों में हुई वोटिंग और मुस्लिमों का विश्वास जीतने में नाकामी जैसे मुद्दों ने आम आदमी पार्टी और दिल्ली की कुर्सी के बीच कुछ फासला रह गया।

15 विधानसभा क्षेत्रों में ‌बिगड़ा खेल
चुनावी नतीजों के बाद हुई समीक्षा बैठक में आप के विश्लेषक इस नतीजे पर पहुंचे कि 15 विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों ने बैटरी टॉर्च के चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया और ये वोट उनके खाते में जा सकते थे।

विश्लेषकों का मानना है कि टॉर्च का निशान देखने में झाड़ू जैसा था, जो आम आदमी पार्टी का निशान है।

जनकपुरी और कालकाजी में भाजपा से हारने वाली आप का कहना है कि दोनों के बीच का अंतर निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोट से भी कम था, जो टॉर्च के निशान पर चुनाव लड़ रहे थे।

वोटों के गणित में पीछे छूटीं पार्टी

कालकाजी में टॉर्च के चिन्ह के साथ लड़े धर्मेंद्र कुमार को 3,092 वोट मिले और आप इस सीट पर भाजपा से 2,044 वोट से हारी। जनकपुरी में आप का उम्मीदवार 2,644 वोट से हारा। टॉर्च ‌चुनाव चिन्ह वाले निर्दलीय उम्मीदवार संजय पुरी को इस सीट पर 4,332 वोट मिले।

आप कार्यकर्ता ने कहा, "हमने यह काउंटिंग के दौर में भी देखा था। टॉर्च ‌चुनाव चिन्ह पर लड़ने वाला निर्दलीय उम्मीदवार हमारे दावेदार के बराबर में बैठा था और उसे मिले वोट पर वह खुद हैरान था।"

इस बात से आप नेतृत्व हिल गया है। चुनाव चिन्ह को लेकर पैदा हुए इस भ्रम ने संभवतः आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी बनने से रोक दिया। इसके अलावा ओखला, सीलमपुर और बल्लीमारान जैसे इलाकों में पार्टी को मुस्लिमों का साथ कुछ खास नहीं मिला।

Source ¦¦ amar ujala