नई दिल्ली। दिल्ली में सरकार गठन पर तीन दिन से छाया कुहासा कुछ छंटता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निर्देश पर बुधवार रात उप राज्यपाल नजीब जंग ने सबसे बड़े दल भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हर्षवर्धन को सरकार गठन पर वार्ता के लिए आमंत्रित कर लिया। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि वार्ता के दौरान उप राज्यपाल भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए हर्षवर्धन को सरकार बनाने के लिए भी कह सकते हैं। यह मुलाकात गुरुवार को होनी है।

गुरुवार का दिन दिल्ली के राजनीतिक भविष्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उप राज्यपाल ने सरकार गठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सबसे बड़े दल के नेता को चर्चा के लिए बुलाया है। वैसे तो भाजपा ने बहुमत के आंकड़े से दूर होने की वजह से सरकार गठन के प्रति अपनी अनिच्छा जाहिर कर दी है और विपक्ष में बैठने की बात कही है, लेकिन उप राज्यपाल की पहल पर उसका यह स्टैंड बदल सकता है। उस दशा में सरकार के बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार, उप राज्यपाल की पहल भाजपा के लिए भी राजनीतिक रूप से मुफीद रहेगी। ऐसे में न तो उस पर सबसे बड़ा दल होने के बावजूद सरकार गठन से बचने का आरोप लगेगा और न ही दिल्ली को दोबारा चुनाव की तरफ धकेलने का लांछन लगेगा। विधानसभा में अगर सरकार विश्वास मत हारती भी है तो उसके पास यह कहने का पर्याप्त अधिकार होगा कि उसने दिल्ली को दोबारा चुनाव से बचाने की भरसक कोशिश की। यह प्रयोग 13 दिन की अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार जैसा ही होगा।

भाजपा को सरकार बनाने का न्योता मिलने में एक-दो दिन का वक्त भी लग सकता है। तब तक उप राज्यपाल आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के नेताओं से भी चर्चा कर सकते हैं। जानकारों का मानना है कि उप राज्यपाल को सरकार गठन का प्रयास करना है तो उनके लिए भाजपा से सरकार बनाने के लिए कहना आवश्यक प्रक्रिया जैसा ही होगा।

लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले हो रही इस कसरत में कांग्रेस बिल्कुल नहीं चाहेगी कि दिल्ली में वह कुछ ऐसा करे, जिससे उस पर प्रक्रिया को धता बताकर राजनीतिक फायदे के प्रयास का दाग लगे।

गुरुवार शाम उप राज्यपाल से होने वाली भाजपा नेता की मुलाकात में जब वह स्पष्ट रूप से सरकार गठन से इन्कार करेंगे तब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का आधार बनेगा, जो दूसरे बड़े दल से वार्ता से बाद पुख्ता स्वरूप ले लेगा।

गौरलतब है कि भाजपा के पास सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को मिलाकर 32 विधायक, आप के पास 28 विधायक, कांग्रेस के पास आठ विधायक और दो विधायक निर्दलीय हैं।

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