जयपुर । प्रतिवर्ष की भांति बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाई जानी वाली विजयदशमी त्यौहार पर जलायें जाने वाले रावण पुतलो की अकेले जयपुर में बिक्रीपर कोरोना ने क्रोस लगा दिया है। कोरोना संक्रमण के चलते त्यौहारों के अवसर पर सामाजिक आयोजनों पर रोक है जिसके कारण शहर के विभिन्न स्थानों मानसरोवर, मालवीयनगर, वैशाली नगर, दिल्ली रोड़, झोटवाड़ा के कुछ चुनिंदा स्थानों पर 15 हजार कारीगरों द्वारा रावण को जलाने के लिए छोटे बड़े पुतले बनाये जाते है जिससे करीब 70 लाख के आसपास व्यापार होता है मगर कोरोना के बचाव की गाइडलाइन के कारण कारीगरों ने पुतलों को आकार तो दिया है पर खरीददारों की सूची नदारद है। इसलिए पुतलों की बिक्री नहीं हुई है जिसका असल कारण सरकार ने शहर के करीब 16 स्थानों पर जहां रावण दहन किया जाता है वहां पर रावण दहन पर प्रतिबंध लगा दिया है। रावण मंडी के अध्यक्ष जगदीश नारायण हेड़ा ने बताया कि इस बार तो कारीगरों का खर्चा निकलना दुभर हो रहा है जबकि कोरोना बीमारी को देखते हुए इस बार कोरोना की शक्ल के भी रावण बनाये गए फिर भी रावण के पुतलो की बिक्री ना के बराबर रही।
कोटा के नान्ता में अनूठी मान्यता :- राजस्थान की शिक्षा नगरी कहीं जाने वाली कोटा में रावण दहन में मिट्टी के रावण का निर्माण कर उसे पैरो तले रौदने की परंपरा सदियों से चली आ रही है लिम्जा माता के दरबार में इस उत्सव की शुरूआत होती है रावण को रौंदने के बाद उसी मिटटी के ऊपर अखाड़ा लगता है जहां मनयुद्ध होता है और कई पलवान अपनी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते है।
जोधपुर में होती है रावण की पूजा :- राजस्थान के जोधपुर शहर में रावण मंदोदरी दोनो के मंदिर है जहां उनकी विधिवत पूजा की जाती है मान्यता के अनुसार  मंदोदरि के साथ रावण का विवाद जोधपुर में हुआ था उस समय बारात में आये उन लोगों के कुछ पूर्वज यही बस गए थे इन लोगों ने रावण का मंदिर बनवा रखा है और नियमित रूप से रावण की पूजा की जाती है मंदिर के पुजारी कमलेश दबे का कहना है कि इस दिन हम शोक मनाते आये है और इस बार भी ऐसा ही होगा शाम को स्न्नान कर अपनी जेनुऊ बदलने के साथ ही शाम को पूजा अर्चना के साथ हम लोग अपने जनेऊ बदलते है। पुजारी के अनुसार 2008 में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।