दीपक बिड़ला, भोपाल
कई उपलब्धियों का तमगा हासिल कर चुका मध्यप्रदेेश इस बार कोरोना वायरस से लड़ाई में असहज दिखाई दे रहा है। प्रदेश की राजधानी भोपाल औैर आर्थिक राजधानी इंदौैर में लगातार सामने आ रहे कोरोना पाॅजिटिव मरीजों की संख्या इस तरफ साफ इशारा कर रही हैै। दरअसल इंदौर शहर देश केे उन शहरोें में शुुमार है, जो लगातार स्वच्छता में देशभर में नंबर एक पर बना हुआ है। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा कारण इंदौैर के शहरवासियोें की जागरूकता भी है, लेकिन कोेरोेना कोे हरानेे में इंदौैरवासियों की यह जागरूकता दिखाई नहीं दे रही है। यही स्थिति राजधानी भोपाल की भी है। स्वच्छता में नंबर दोे का तमगा लेे चुकेे भोेपाल ने भी कोरोेना वायरस के सामनेे घुटनेे टेेक दिए हैैं।


राजधानी भोपाल मेें सबसेे पहले केवल एक मरीज में ही कोेरोना पाॅजिटिव पाया गया था, लेकिन अब स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही हैै। इसके पीछेे जहां प्रशासनिक लापरवाही सबसे बड़ी वजह रही तोे वहीं राजनीतिक उठापटक ने भी कोई कोेर-कसर नहीं छोड़ी। जिस समय कोरोना वायरस मध्यप्रदेश में अपनेे पैैर पसार रहा था उस समय भाजपा प्रदेश की कांग्रेस सरकार को गिरानेे में लगी हुई थी तोे वहीं कांग्रेेस सरकार अपनेे कोे बचानेे केे चक्कर में कोरोेना संकट पर ध्यान ही केंद्रित नहीं कर पाई। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अब जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट उस समय बैैंगलुरू में जाकर कैैद होे गए। सारा दारोमदार अधिकारियोें पर आ गया, लेकिन इस मामलेे में सबसेे बड़ी लापरवाही अधिकारियों की ही सामने आई हैै। स्वास्थ्य विभाग की तत्कालीन अपर मुख्य सचिव पल्लवी जैन गोेविल खुद अपनेे कोे कोेरोेना वायरस सेे नहीं बचा सकी। वेे खुद तोे कोरोेना पाॅजिटिव हो गईं, उनकेे साथ मेें स्वास्थ्य विभाग केे कई अधिकारियोें सहित अन्य स्टाॅफ भी कोरोेना वायरस की चपेट में आ गया। बताया जा रहा हैै कि पल्लवी जैन गोविल ने यह तथ्य छुपाया था कि उनका बेटा विदेेश सेे आया औैर बेेटेे केे कारण ही वे भी कोरोना की चपेट में आई। आखिरकार एक वरिष्ठ अधिकारी इतनी बड़ी गलती कैसेे कर सकता है?


पर्याप्त संसाधनोें का भी अभाव-
कोरोेना की लड़ाई में सरकार सहित पूरे प्रदेश की जनता जी-जान से लगी हुई हैै, लेकिन फिर भी संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति कोे देेखकर लगता हैै कि इतनी जल्दी इस संकट सेे निजात भी मिलना मुश्किल हैै, लेकिन इसी बीच केंद्र सरकार नेे कई रियायतोें के साथ नया आदेेश भी जारी कर दिया है। क्या इस समय ये आदेेश होना चाहिए था? सरकार कोे अभी ये रियायतेें नहीं देेनी चाहिए थी, क्योेंकि अब रियायत मिलनेे केे बाद लोगोें की आवाजाही ज्यादा बढ़ेेगी औैर फिर वही भयावह स्थिति सामनेे आ सकती है, जिसका सभी कोे डर हैै। कोरोना जैसी महामारी सेे लड़ रही सरकार के पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं है। टेस्ट किट सहित मैदानी टीम को पर्याप्त सुरक्षा भी मुहैया नहीं कराई जा रही है। सरकारी अस्पतालों की भी स्थिति बेहतर नहीं है। यही कारण है कि निजी अस्पतालों के भरोसे पर काम चल रहा है। सरकार द्वारा जितनी सुविधाएं औैर पैसा इन निजी अस्पतालों के उपर खर्च किया जा रहा है वह पैसा यदि सरकारी अस्पतालों में ही लगा दिया जाए तोे इन अस्पतालों की स्थिति भी सुधर सकती है। पिछले कुछ सालों में राज्य सरकारों नेे मुख्यमंत्री सहायता कोष केे जरिए जितना पैसा इन निजी अस्पतालों कोे दिया है उस राशि से तोे प्रदेश केे सभी सरकारी अस्पतालों केे दिन फिर जातेे, लेकिन सरकारी सिस्टम औेर इच्छाशक्ति के अभाव नेे यह नेक काम होने नहीं दिया। क्या सरकार प्रदेश की जनता को यह विश्वास दिला सकती है कि इस संकटकाल सेे वे जल्द ही प्रदेेश को उबार देगी?