लखनऊ. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) बीजेपी (BJP) अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की आखिरी तारीख गुरुवार यानी 16 जनवरी है. वैसे तो मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह (Swatantr Dev Singh) का निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा है, लेकिन अगर किसी और ने नामांकन कर दिया तो वोटिंग की नौबत आ सकती है. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि पहले भी कई बार वोटिंग की नौबत आ चुकी है.

जब मुरली मनोहर जोशी ने थकी दावेदारी

जनसंघ से शुरुआत करने वाली राजनीतिक पार्टी आपातकाल के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी. लेकिन पार्टी में सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुनने की परंपरा पहली बार 1974 में ही टूट चुकी थी. उस वक्त चुनाव कराने पर विवश करने वाले नेता थे डॉ.मुरली मनोहर जोशी. जनसंघ के इतिहास में पहली बार 1974 में मतदान के जरिए अध्यक्ष चुना गया. बीजेपी के वरिष्ठतम नेताओं में से एक राजेंद्र तिवारी उस दौर को याद करते हैं. उस वक्त अध्यक्ष पद की दावेदारी के लिए एक तरफ जनसंघ के कद्दावर नेता थे रविंद्र किशोर शाही और दूसरी तरफ तेजतर्रार नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी. पार्टी नेताओं के तमाम प्रयास के बाद भी किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन सकी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने रविंद्र किशोर शाही के खिलाफ नामांकन कर दिया. उस समय जनसंघ की स्थापना सदस्यों में से एक नेता सुंदर सिंह भंडारी चुनाव करवा रहे थे. चुनाव में रविंद्र शाही भारी पड़े और डॉ.जोशी को हरा कर प्रदेश अध्यक्ष बने.


कल्याण सिंह के नामांकन से आई चुनाव की नौबत

दूसरा दौर था 1980 का जब बीजेपी के रुप में पार्टी सामने आ गई थी और माधव प्रसाद त्रिपाठी अध्यक्ष बनने की राह पर थे. उस समय भी सर्वसम्मति नहीं बन पाई और तत्कालीन ऊभरते हुए नेता कल्याण सिंह ने विरोध कर दिया. नेताओं ने एड़ी चोटी एक कर दी कि कल्याण सिंह नामांकन न कर पाएं, लेकिन कल्याण सिंह ने नामांकन कर दिया. फिर भी बीजेपी के नेताओं को भरोसा था कि वे नाम वापस ले लेंगे. नाम वापसी का समय भी निकल गया. एक बार फिर सुंदर सिंह भंडारी संकट मोचन बनकर सामने आए. वे उस समय यूपी के प्रभारी थे. संगठन महामंत्रियों की बैठक बुलाई गई, जिसमें कल्याण सिंह को सरेंडर करने के लिए तैयार कराया गया और चुनाव की प्रक्रिया को टाला गया.

कलराज मिश्रा के दुबारा अध्यक्ष बनने पर फंसा पेंच

1980 के बाद एक दौर और आया और वो था वर्ष 2000 का. जब कलराज मिश्र दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनने को थे. बीजेपी के कद्दावर नेताओं को लगने लगा कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. हुआ भी वही उस समय रामप्रकाश त्रिपाठी सामने आए और अध्यक्ष के पद के लिए नामांकन कर दिया. उस समय भी बीजेपी के दिग्गजों ने सर्वसम्मति की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. अब इसे संयोग कहा जाए या कुछ और स्क्रूटनी के दौरान रामप्रकाश त्रिपाठी का पर्चा ही खारिज हो गया और बीजेपी चुनाव कराने से बच गई.

आज है नामांकन

अब एक बार फिर अध्यक्ष का चुनाव सामने है. चुनाव अधिकारी आशुतोष टंडन ने चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया है. प्रदेश अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए 16 जनवरी को दोपहर 2 से शाम 4 बजे तक चुनाव पर्यवेक्षक राष्ट्रीय महामंत्री भूपेंद्र यादव एवं बिहार के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किए जाएंगे. शाम 4 से 5 बजे तक नामांकन पत्रों की जांच होगी. शाम 5 से 6 बजे तक नाम वापसी की जा सकेगी. नाम वापसी के बाद एक से अधिक उम्मीदवार होने पर 17 जनवरी को प्रदेश मुख्यालय में सुबह 9 से 11 बजे तक मतदान होगा, उसके बाद मतगणना होगी.

क्या इस बार भी कोई नेता मैदान में ताल ठोकेगा? इस सवाल के जवाब में बीजेपी के महामंत्री विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि बीजेपी एक लोकतांत्रिक पार्टी है और बूथ स्तर से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक के चुनाव होते हैं. इसमें कुछ भी नया नहीं है. पार्टी ने पहले भी लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराया है और आज भी लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हो रहा है.

सभी पधाधिकारियों को लखनऊ बुलाया गया

कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह 16 जनवरी को अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करेंगे. बीजेपी के चुनाव अधिकारी आशुतोष टंडन ने प्रांतीय परिषद सदस्यों की घोषणा कर दी है. पश्चिम क्षेत्र से 66, ब्रज से 61, कानपुर बुंदेलखंड से 45 अवध से 74, काशी से 59 और गोरखपुर से 59 सदस्यों के नाम की धोषणा की गई है. सदस्यों को 17 जनवरी को पार्टी मुख्यालय पर बुलाया गया है. यही लोग प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करेंगे.

वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव कहते हैं कि राजनीतिक दलों में नेता का चुनाव एक कोरम भर रह गया है. चुनाव आयोग के निर्देश के चलते पार्टियां चुनाव भी कराती हैं. बीजेपी में जरुर कुछ मौके ऐसे आए हैं, लेकिन इस बार का चुनाव कोरम ही साबित होगा. वैसे परिस्थितियों को देखते हुए अध्यक्ष पद पर स्वतंत्र देव सिंह का निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है.