कर्नाटक के उडुपी से स्कूलों में हिजाब पहनने के सवाल पर शुरू हुआ विवाद सियासी रंग लेता जा रहा है। कई राज्यों में स्कूल और कॉलेजों में ड्रेस कोड की बात भी उठ रही है। हिजाब के विरोध और हिजाब के समर्थन में राष्ट्र स्तर पर बहस चालू हो गई है। वैसे देखा जाए तो खानपान और पहनावा हर व्यक्ति नितांत व्यक्तिगत मामला है। किसी भी इनसान को क्या पहनना है, क्या खाना यह उसकी खुद की पसंद, नापसंद पर निर्भर है, इसमें बाहरी लोग हस्तक्षेप नहीं कर सकते, लेकिन जब बात स्कूल और कॉलेजों की आती है, तो एकरूपता, एकसमानता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। आखिर स्कूल-कॉलेजों में यूनिफॉर्म की संकल्पना क्यों लाई गई? इसकी क्या वजह थी। बच्चे अपनी मर्जी से कपड़े, जूते पहनकर स्कूल जा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

स्कूल-कॉलेजों में एकरूपता से कतई समझौता नहीं किया जा सकता

प्राचीनकाल में गुरुकुलों में राजा का बच्चा हो या रंक का, सभी को एकसमान पहनावा अनिवार्य था। आखिर शिक्षा संस्थानों में अलग-अलग पहनावे को स्वीकार कर जाति, धर्म, आस्था के प्रतीक चिन्ह को अनुमति कैसे दी जा सकती है? हमारा देश समानता की बुनियाद पर खड़ा है। स्कूल-कॉलेजों में अगर बच्चों को मर्जी से कपड़े पहनने की  छूट दी गई, तो शिक्षा के इन संस्थानों में जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी के बीच गहरी खाई बन जाएगी। अमीरों के बच्चे महंगे कपड़े, महंगे जूते, महंगी घडिय़ां पहनकर स्कूल जाएंगे, जबकि गरीबों के बच्चे ऐसा नहीं कर पाएंगे। इससे उनके मन में एक-दूसरे के प्रति असमानता का भाव पैदा होगा। गरीबों के बच्चों में निराशा का भाव आएगा। बच्चों के मन में समानता का भाव बना रहे, इसलिए स्कूलों में यूनिफॉर्म लागू की गई। अमीर का बच्चा हो या गरीब का, सभी एक समान यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल जाएं। उनमें किसी तरह का भेदभाव न रहे। यही वजह है कि स्कूल और कॉलेज के लिए यूनिफॉर्म का निर्धारण हमेशा से होता रहा है। आज भी कॉन्वेंट स्कूल हों या बड़े-बड़े प्रायवेट स्कूल, उनमें यूनिफॉर्म लागू है। उसे सभी पंथ, मजहब और आस्थाओं के लोग स्वीकार भी करते हैं। फिर सरकारी स्कूलों में ड्रेस कोड के खिलाफ बवाल क्यों? स्कूल सबके लिए समान हैं। ऐसे में एक धर्म विशेष के लोगों को मनमर्जी करने की छूट नहीं दी जा सकती। निजी स्तर पर हिजाब पहनने पर न तो कोई सरकार रोक लगा सकती है और न लगाना चाहिए।

लड़कियों को पीछे रखने का षड्यंत्र तो नहीं

आधुनिक समय में हर चीज़ लगातार अपडेट हो रही है। ऐसे में समय के साथ मान्यताओं, प्रथाओं को भी अद्यतन किया जाना जरूरी है। महिलाएं बराबरी के साथ पढ़ाई, लिखाई और तरक्की करना चाहती हैं। धार्मिक विश्वास के नाम पर हिजाब की संस्कृति लड़कियों को पीछे रखने का षड्यंत्र तो नहीं है। ऐसा लगता है यह विवाद अनावश्यक है और इसे जानबूझकर बढ़ाया जा रहा है। आज लड़कियों में आगे बढऩे की हिम्मत और हौसला बढ़ाने की जरूरत है, न कि ऐसे सवाल उठाकर उन्हें पीछे धकेलने की जरूरत है। दुनिया में पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाएं बुर्के और हिजाब के खिलाफ़ मुहिम चला रही हैं. इस मुहिम को बड़े पमाने पर मुस्लिम पुरुषों का भी समर्थन मिल रहा है। भारतीय मुस्लिम समाज में पर्दे को लकर काफी खुलापन आया है। मुस्लिम लड़किया बुर्का या हिजाब पहने या नहीं ये उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए. ये उनका संवैधानिक अधिकार भी है। स्कूलों में ड्रेस कोड के नाम पर बुर्के या हिजाब के खिलाफ प्रोपगंडा चलाना उचित नहीं है।

कुरान में हिजाब का उल्लेख नहीं

कुरान में हिजाब का उल्लेख नहीं बल्कि खिमार का उल्लेख किया गया है। हिजाब और खिमार दोनों तरीकों से महिलाओं अपना शरीर ढक सकतीं है। हालांकि इन दोनों तरीकों से शरीर को ढकने के तरीके में थोड़ा सा अंतर है। सूरह अल-अहजाब की आयत 59 में कहा गया है-ऐ पैगम्बर, अपनी पत्नियों, बेटियों और ईमान वालों की महिलाओं से कहा कि वे अपने बाहरी वस्त्रों को अपने ऊपर ले लें। यह ज्यादा उपयुक्त है। न उन्हें पहचाना जाएगा और न उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा। अल्लाह सदैव क्षमाशील और दयावान है।

बिकनी पर विवाद में फंस गईं प्रियंका

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी मंझे हुए राजनेता की तरह सधे हुए बयान देती हैं, जिससे वे कभी विवादों में नहीं फंसती, लेकिन हिजाब वाले मामले में वे विवादों में घिर गई। हिजाब के समर्थन में उतरीं प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कहा कि चाहे वह बिकिनी हो, घूंघट हो, जींस की जोड़ी हो या हिजाब; यह तय करना एक महिला का अधिकार है कि वह क्या पहनना चाहती है। यह अधिकार भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत है। महिलाओं को प्रताडि़त करना बंद करो। इस ट्वीट के बाद वे जमकर ट्रोल हुर्ईं। एक यूजर ने लिखा कि प्रियंका गांधीजी, कोई एक लड़की बताओ, जो बिकिनी, घूंघट या सिर्फ अकेली जींस में स्कूल जाती है! कृपया तथ्यों पर बात करें। मुद्दा स्कूल यूनिफॉर्म का है और कुछ नहीं।