वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूरे देश में सिर्फ 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी। फिर भाजपा ने हिंदुत्व का कार्ड चला और देखते ही देखते उसकी इतनी सीटें आ गईं कि वह केंद्र की सत्ता में काबिज हो गई। फिर दोबारा सत्ता में आने के लिए उसने राष्ट्रवाद का कार्ड चला और 303 सीटों के साथ वह दोबारा केंद्र की सत्ता में आ गई। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो गया है। महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है। सरकार को इन दोनों ही मुद्दों से निपटने का कोई कारगर उपाय नहीं मिल रहा है, जिससे लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी है। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की चमक भी फीकी पड़ती जा रही है, इसलिए भाजपा सरकारें अब विभिन्न योजनाओं में लोगों के खातों में नकद राशि भेजकर वोटों को साधने में जुट गई हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बकायदा इसका प्रयोग किया जा रहा है। सरकार यदि इस प्रयोग में सफल होती है, तो अन्य राज्यों में भी यह प्रयोग दोहराया जाएगा। हालांकि भाजपा की राज्य सरकारों ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है और इसका प्रचार-प्रसार भी शुरू हो गया है।

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शिवराज सरकार ने सबसे पहले चुनाव में किसानों को साधने के लिए उनके खातों में राहत राशि भेजना शुरू किया है। सरकार ने 22 महीने में एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए किसानों के खाते में डाल चुकी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को ही बैतूल से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में करीब 49 लाख किसानों के खातों में 7618 रुपए का मुआवजा ट्रांसफर किया। उन्होंने मंच से 22 महीने का पूरा हिसाब भी दिया और नाथ सरकार के समय किसानों की उपेक्षा का ब्योरा भी किसानों के बीच परोसा। जल्द ही सरकार ओला पीडि़त करीब एक लाख 72 हजार किसानों को 277 करोड़ रुपए की राहत राशि बांटेगी। हाल में सीएम शिवराज ने महिला स्व सहायता समूहों को 300 करोड़ रुपए का ऋण वितरित किया था। किसानों के साथ ही सरकार का फोकस गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों पर है। विभिन्न योजनाओं में इनके खातों में केंद्र सरकार नकद राशि ट्रांसफर कर रही है। कोरोना काल में केंद्र सरकार ने महिलाओं के खाते में अच्छी खासी राशि ट्रांसफर की। इन सबसे ज्यादा मध्यमवर्गीय लोग परेशान हैं। उनका मानना है कि हम टैक्स चुका रहे हैं और हर तरह की सुविधा बीपीएल कार्डधारकों को दी जा रही है। मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे चुनाव का वक्त नजदीक आएगा, हितग्राहियों के खातों में विभिन्न योजनाओं में और ज्यादा राशि ट्रांसफर की जाएगी।

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हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की केमिस्ट्री

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के घोषणा पत्र ज‍िसे बीजेपी संकल्प पत्र कहती है. इस बार बीजेपी का संकल्प पत्र 16 पन्नों का है, यह 2017 में 32 पन्नों का था. सिर्फ पन्नों में ही नहीं बल्कि वादों में भी कमी हुई है. 2017 में करीब 200 से ज्यादा वादे किए गए थे. इस बार करीब 130 वादे किए गए हैं. बीजेपी के घोषणा पत्र में इस बार हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की झलक दिखी। कुछ खास वादे...

-  बीजेपी लव जिहाद के मुद्दे पर आक्रामक रही है. इस बार बीजेपी ने वादा किया है कि सरकार बनने पर लव जिहाद करने वाले को 10 साल की कैद और 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा का प्रावधान किया जाएगा।

- बीजेपी के घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का वादा हमेशा रहता था. पिछली बार भी था. लेकिन अब चूंकि ये वादा पूरा हो गया है, इसलिए पार्टी ने इस बार अयोध्या और भगवान राम से जुड़ा नया वादा किया है। बीजेपी ने अयोध्या में रामायण विश्वविद्यालय बनाने का वादा किया है।

- बुजुर्ग संत, पुजारियों और पुरोहितों से जुड़ी कल्याण की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एक विशेष बोर्ड बनाया जाएगा. मां सकुंभरी देवी के नाम का विश्वविद्यालय बनेगा. वाराणसी, मिर्जापुर और चित्रकूट में रोप-वे बनेगा. इसके अलावा मथुरा में सूरदास ब्रजभाषा अकादमी की स्थापना होगी साथ ही गोस्वामी तुलसीदास अवधी अकादमी भी स्थापित की जाएगी।

- बीजेपी अक्सर दूसरी पार्टियों पर महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाती रही है. इस बार बीजेपी ने घोषणा पत्र में वादा किया है कि अगर सरकार बनी तो सभी महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियों को पढ़ाई में शामिल किया जाएगा।

राज्य और जनता के बारे में भी सोचें पार्टियां

देखा जाए तो किसी भी राज्य के चुनावों में सबसे अहम किरदार उस राज्य की जनता का होता है। राज्य की जनता ही अपने राजनेता को वोट के माध्यम से चुनकर सत्ता पर काबिज करती है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों का यह प्राथमिक कर्तव्य होता है कि वो जनता के हितों को ध्यान में रखकर कार्य करें, योजनाएं बनाएं और उन पर क्रियान्वयन करें। इससे न सिर्फ राज्य का बल्कि वहां रहने वाली जनता का भला तो होगा ही, साथ ही राजनेताओं के प्रति जनता का विश्वास और मजबूत होगा। क्योंकि अभी तक पूरे राज्य में आलम यह है कि राजनेता वोट तो मांग रहे हैं लेकिन उनकी इस मांग के पीछे जनता से जुड़े लाभ और उनके हित तो दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसलिए बेहतर है राजनेता राज्य और राज्य की जनता के बारे में जरूर सोचें।