मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार पिछले दो साल से प्रदेश के 10 लाख कर्मचारियों को भरमा रही है। कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए कमलनाथ सरकार के समय बनाया गया कर्मचारी आयोग दो साल पहले भंग हो चुका है। आयोग में न अध्यक्ष है और न ही सदस्य हैं। इसके बाद भी सरकार आयोग का कार्यकाल बढ़ाती जा रही है। बिना अध्यक्ष और सदस्यों वाला आयोग कर्मचारियों की कितना भला कर पाएगा, यह तो सरकार ही जाने। कर्मचारियों को केंद्र के समान महंगाई भत्ता मिलने, साढ़े पांच साल से प्रमोशन पर लगी रोक हटने, संविदा कर्मचारियों को नियमितीकरण का बेसब्री से इंतजार है।

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कमलनाथ सरकार ने किया था कर्मचारी आयोग का गठन

दरअसल, कमलनाथ सरकार ने अपने वचन पत्र में किया गया वादा निभाते हुए 12 दिसंबर, 2019 को कर्मचारी आयोग का गठन किया था। सेवानिवृत्त आईएएस अजय नाथ को आयोग का चैयरमैन और वित्त विभाग के सेवानिवृत्त उप सचिव मिलिंद वाईकर को आयोग का सचिव बनाया गया था। इसके अलावा कर्मचारी नेता वीरेंद्र खोंगल, सेवािनवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश योगेश कुमार सोनगरिया, राच्य योजना आयोग के तत्कालीन सलाहकार अखिलेश अग्रवाल, जीएडी और वित्त विभाग के सचिव को सदस्य बनाया गया था। आयोग का कार्यकाल एक वर्ष रखा गया था। आयोग के दायरे में राज्य सरकार के अधिकारी-कर्मचारियों, निगम-मंडलों, अर्ध सरकारी संस्थाओं के मुलाजिमों के साथ संविदा कर्मचारी, अंशकालिक और पूर्णकालिक वेतन पाने वाले करीब 10 लाख कर्मचारियों को रखा गया था। आयोग के गठन का मकसद कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों समेत अन्य समस्याओं का अध्ययन कर आवश्यक सुझाव सरकार को देना था। आयोग ने गठन के बाद विभिन्न मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर उनकी समस्याएं सुनकर प्रतिवेदन तैयार किया था। यह सिफारिशें राज्य शासन को सौंपने से पूर्व ही आयोग का कार्यकाल पूरा हो गया और सिफारिशें ठंडे बस्ते में चली गईं। सरकार ने पहली बार दिसंबर, 2020 में आयोग का कार्यकाल एक साल बढ़ाने के संबंध में आदेश जारी किए, लेकिन आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 11 दिसंबर, 2020 तक ही रखा गया और उस समय कहा गया था कि आयोग के पुनर्गठन और अध्यक्ष व सदस्यों के नए मनोनयन की कार्रवाई अलग से की जाएगी। साल भर से ज्यादा बीत जाने के बाद भी सरकार आयोग का पुनर्गठन नहीं कर पाई, जबकि हाल में सरकार ने फिर से आदेश जारी कर आयोग का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया है। अब आयोग का कार्यकाल 11 दिसंबर, 2022 को पूरा होगा।

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कर्मचारियों को भ्रम में रखे हुए है सरकार

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार कर्मचारी आयोग का कार्यकाल बढ़ाकर कर्मचारियों को भ्रम में रखे हुए हैं, क्योंकि बिना अध्यक्ष और सदस्यों के कर्मचारी आयोग औचित्यहीन है। सरकार को आयोग का तत्काल पुनर्गठन कर आयोग की ओर से तैयार किए गए प्रतिवेदन पर कार्रवाई करना चाहिए। कर्मचारी आयोग के पूर्व सदस्य  वीरेंद्र खोगल का कहना है कि आयोग ने करीब 80 मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारियों की समस्याएं सुनकर प्रतिवेदन तैयार किया था। कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण संबंधी सिफारिशें सरकार को सौंपने से पहले ही आयोग का कार्यकाल समाप्त हो गया। राज्य कर्मचारी कल्याण समिति के पूर्व सदस्य शिवपाल सिंह का कहना है कि विभिन्न विभाग कर्मचारियों की समस्याओं संबंधी रिपोर्ट कर्मचारी आयोग को भेज चुके हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। आयोग का पुनर्गठन किए बगैर उसका कार्यकाल बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार आयोग का पुनर्गठन जल्द करे, ताकि कर्मचारियों की समस्याओं का निराकरण हो सके।

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