हर व्यक्ति अपने घर में सुख समृद्धि चाहता है और वह इसके लिए हर मुमकिन प्रयास भी करता है, लेकिन कभी-कभी तमाम कोशिश के बावजूद घर में सुख समृद्धि नहीं आ पाती। कई बार ऐसा होता है,जब वास्तु दोष के कारण घर में नकारात्मक उर्जा का वास हो होता जिससे घर में रहने वाले सदस्यों को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आज हम आपको बतायेंगे उत्तर दिशा के उन आठ पदों के बारे में जिनका वराहमिहिर के समरांगण सूत्रधार ग्रंथ में वर्णन है।

- उत्तर पश्चिम दिशा के पहले पद का नाम रोग है, अगर घर का द्वारा उत्तर पश्चिम दिशा में बनाया जाता है तो व्यक्ति घर से बहर रहता है।उसे शत्रु से हमेशा परेशानी मिलती हैं।कार्यों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न होती है ।
- उत्तर दिशा का दूसरा पद नाग के नाम से जाना जाता।इस पद पर भी द्वारा बनाना शुभ नहीं होता है। ऐसा करने से भी शत्रु संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। लोग गृह स्वामी से इर्ष्या रखते हैं। खर्चे बढ़ जाते हैं। घर में हमेशा आर्थिक समस्या बनी रहती है।

- उत्तर दिशा का तीसरा मुख्य पद है। इस स्थान पर द्वार शुभ होता है,इस दिशा में घर होने से हमेशा मंगल होता है। पर में सुख समृद्धि का वास होता है। परिवार में सदैव उन्नति होती होती है। घर में हमेशा मंगल कार्य होते रहते हैं।

- उत्तर दिशा के चौथे पद को भल्लाट के नाम से जाना जाता है। इस दिशा में द्वारा बनना बहुत ही शुभकारी होता है। इस दिशा में द्वार होने से घर में आर्थिक समस्या कभी नहीं आती। घर के सभी सदस्यों के व्यापार और नौकरी में वृद्धि होती रहती हैं। धन का आवागमन हमेशा प्रचुर मात्रा में बना रहता है क्योंकि इस स्थान पर कुबेर देवता का वास होता है। अतः निरंतर धन वृद्धि होती रहती है। तिजोरी धन से भरी रहती है।

- उत्तर दिशा का पांचवा पद सोम होता है। यह स्थान भी द्वार बनाने के लिए शुभ होता है। इस स्थान पर द्वार बनने से सुख समृद्धि के सभी रास्ते खुल जाते हैं। आर्थिक उन्नति में हमेशा वृद्धि होती है, घर में समय-समय पर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।

- उत्तर दिशा के छठे पद को सर्प कहते हैं। इस स्थान पर द्वारा बनाना अमंगलकारी होता है। इससे घर में सदस्यों को समाज में सम्मान नहीं मिलता। आपस में भी झगड़े होते रहते हैं,इस दिशा में रहने वाले लोग अवसर वादी होते हैं। समाज के प्रति भी इनका व्यवहार स्वार्थी और मतलबी होता है।

- उत्तर दिशा का सातवें पद को अदिति के नाम से जाना जाता है। इस पद की और घर का द्वार होने से कार्यों में रुकावट आती है। घर की गृह स्वामिनी व अन्य महिलाएं बीमार रहती है। ऐसे घर के बच्चे अधिकाशंत: इंटरकास्ट शादी करते है। घर के सदस्य आपस में ही बड़ों का सम्मान नहीं करते।

- उत्तर दिशा का आठवां और अंतिम पद है दिति, इस स्थान को भी द्वार बनाने के लिए ज्यादा शुभ नहीं माना जाता है। हां अगर द्वार बनाने का कोई और स्थान नहीं है तो इस दिशा में द्वार बनाया जा सकता है,लेकिन इधर द्वारा बनाने से आर्थिक दिक्कत थोड़ी बहुत बनी रहती है बचत नहीं हो पाती।