उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में पहले चरण के लिए वोटिंग का वक्त नजदीक आ गया है। तमाम राजनीतिक दलों ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। चुनाव में वोट की खातिर जाति, धर्म, किसान, महंगाई, बेरोजगारी...जैसे मुद्दे उछाले जा रहे हैं। भाजपा भी दोबारा सत्ता में आने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी या नहीं, यह तो आगामी 10 मार्च को पता चलेगा, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि भाजपा सत्ता में वापसी करती है, तो क्या योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे? राजनीति के जानकार कहते हैं, दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है और लखनऊ को जीते बिना दिल्ली को जीतना मुमकिन नहीं है। ऐसे में समाजवादी पार्टी हो, बसपा हो या कांग्रेस हो, इनका सत्ता में आना तभी संभव है, जब ये चुनाव में एकतरफा जीत हासिल करें। यदि भाजपा और अन्य किसी विपक्षी दल के बीच हार-जीत का अंतर कम रहता है, तो भाजपा आसानी से सत्ता नहीं छोड़ेगी। वह वोट काउंटिंग में खेल करके या अन्य दलों में तोड़-फोड़ करके हर हाल में सत्ता पर काबिज करने की कोशिश करेगी, क्योंकि उसे सवा दो साल बाद दिल्ली में भी वापसी करना है।

लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए सेमी-फायनल

भाजपा यह भलीभांति जानती है कि उत्तरप्रदेश हाथ से जाता है, तो आने वाले समय में गुजरात, मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों में जहां विधानसभा चुनाव होना है, उसके लिए मुश्किल खड़ी होगी और इसका सीधा असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। कुल मिलाकर उत्तरप्रदेश चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए सेमी-फायनल कह तरह है। जिस तरह सपा मुखिया अखिलेश यादव ने चुनावी बिसात बिछाई है, उससे पार पाना भाजपा के लिए आसान नहीं है। यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के बाद भाजपा पहली पार्टी होगी, जो पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी करेगी।

योगी आदित्यनाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली पसंद

बहस का मुद्दा यह भी है कि क्या सत्ता में आने पर भाजपा योगी आदित्यनाथ के हाथ में फिर से उत्तरप्रदेश की कमान सौंपेगी या फिर उन्हें गोरखपुर में बैठाकर लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किसी ओबीसी नेता को राज्य की बागडोर सौंपेगी। योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगते रहे हैं कि वे ठाकुरों की राजनीति करते हैं, इसलिए उनसे ब्राम्हण, ओबीसी और दलित वर्ग के लोग नाराज हैं। देश में योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए वे जिस बेबाकी से हिंदुओं के समर्थन में और मुस्लिम विरोधी बयान देते रहे हैं, इससे उनकी छवि कट््टर हिंदू नेता की बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अन्य कोई भाजपा नेता मुख्यमंत्री रहते योगी की तरह दमदारी से हिंदुत्व का खुला समर्थन नहीं कर पाया। यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली पसंद बन गए हैं।

प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार

यदि योगी दोबारा मुख्यमंत्री बनते हैं, तो प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हो जाएंगे। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नहीं चाहेंगे कि योगी आदित्यनाथ को दूसरी बार सत्ता की कमान सौंपी जाए, लेकिन योगी भी कम नहीं हैं। पिछली बार भी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं था, लेकिन योगी की जिद और आरएसएस के दबाव में आकर आनन-फानन में योगी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया था। गौर करने वाली बात यह है कि योगी आदित्यनाथ ने भी मुख्यमंत्री रहते तमाम फैसले अपनी मर्जी से और दमदारी से लिए। कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वे प्रधानमंत्री मोदी के दबाव में हों या उनके आगे झुके हों। ऐसे में यदि भाजपा चुनाव में बहुमत हासिल करती है, तो योगी को किनारे करना आसान नहीं होगा। और यदि भाजपा ऐसा करती है, तो पार्टी के अंदर 'महाभारत' छिड़ सकती है। वर्ष 2017 में जब योगी पहली बार सीएम बने थे, तब वे सिर्फ सांसद थे। इसके बाद भी बड़ी संख्या में उन्हें भाजपा विधायकों का समर्थन था। चूंकि अब वे पांच साल मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए इस बात को सहज ही समझा जा सकता है कि बहुत से विधायक ऐसे होंगे, जो आंख मूंदकर योगी का समर्थन करेंगे। भाजपा के सत्ता में आने पर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं, यह आने वाला वक्त बताएगा।