बिलासपुर । पंथी गीत और नृत्य छत्तीसगढ़ का एक ऐसा लोक संगीत है, जिसमें अध्यामिकता की गहराई तो है ही, साथ ही भक्त की भावनाओं की ज्वार भी है। इसमें जितनी सादगी है, उतना ही आकर्षण और मनोरंजन भी है। इन्हीं विशेषताओं के साथ बिलासपुर जिले के तखतपुर विकासखंड के युवाओं की टोली मांदर की थाप, झांझ की झंकार और बाबा की जयकार के साथ राजधानी रायपुर में 12 से 14 जनवरी तक आयोजित युवा महोत्सव में पंथी नृत्य प्रस्तुत करेंगे। 
बाबा गुरू घासीदास के पंथ से ही पंथी नृत्य का नामकरण हुआ। पंथी गीत एवं नृत्य आम छत्तीसगढ़ी बोली में होते हैं। जिनमें शब्दों और संदेशों को एक साधारण व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है। कबीर रैदास और दादू आदि संतों का वैराग्य युक्त अध्यात्मिक संदेश भी इसमें पाया जाता है। 
बाबा गुरूघासीदास जयंती 18 दिसंबर से पूरे माह भर पूरे छत्तीसगढ़ में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ उत्सव के रूप में मनायी जाती है। इस उपलक्ष्य में गांव-गांव में मड़ई मेला का आयोजन होता है। इसमें सतनाम के प्रतीक जैतखाम पर नया श्वेत ध्वज फहराया जाता है। इस दौरान जैतखाम के आस-पास बड़े उत्साह के साथ पंथी नृत्य किया जाता है। वास्तव में पंथी नृत्य धर्म, जाति, रंग रूप आदि के आधार पर भेदभाव, आडंबर और मानवता विरोधी विचारों का संपोषण करने वाली व्यवस्था पर वर्षों से शोषित लोगों और दलितों का करारा किंतु सुमधुर प्रहार है। 
यह छत्तीसगढ़ की सतनामी जाति के लोगों का पारंपरिक नृत्य है, जो सतनाम पंथ के पथिक हैं। इस पंथ की स्थापना छत्तीसगढ़ के महान संत गुरू घासीदास ने की थी। पंथी नर्तकों की टोलियां आज छत्तीसगढ़ के हर सतनामी बहुल बस्ती में बन गई है। पंथी गीत-नृत्य गुरू घासीदास बाबा की आराधना का साधन है। 
सतनाम के हो बाबा, पूजा करौं सतनाम के।
सतनाम के हो बाबा, पूरा करौं जैतखाम के।।
पंथी नृत्य मांदर की थाप, झांझ की झंकार बाबा की जयकार के साथ शुरू होता है। सत्यनाम का सुमिरन करते हुए गोल घेरे में खड़े पंथी दल के नर्तक संत गुरू घासीदास बाबा की स्तुति में यह गीत शुरू करते हैं। प्रारंभ गीत संगीत और नृत्य की गति धीमी होती है। जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ता है और मृदंग की लय तेज हो जाती है, वैसे ही पंथी नृतकों की शारीरिक क्रियाएं तेज हो जाती है। गीत के बोल और अंतरा के साथ ही नृत्य की मुद्राएं बदल जाती है। बीच-बीच में मानव मीनार की रचना और हैरतअंगेज कारनामें भी दिखाए जाते हैं। पंथी नर्तकों की वेशभूषा सादी होती है। पर समय के साथ वेशभूषा में कुछ परिवर्तन भी आया है। 
छत्तीसगढ़ी भाषा को नहीं जानने और समझने वाले देश-विदेश के लोग भी पंथी नृत्य देख खो जाते हैं। वर्तमान समय में भी छत्तीसगढ़ के कलाकारों के साधना, परिश्रम और  लगन का परिणाम है कि पंथी नृत्य देश-विदेश में प्रतिष्ठित है।