Saturday, December 10, 2022
HomeखबरेंGyanvapi Case: शिवलिंग की पूजा की मांग के आवेदन पर सुनवाई...

Gyanvapi Case: शिवलिंग की पूजा की मांग के आवेदन पर सुनवाई टली, अगली तारीख 14 नवंबर

वाराणसी | ज्ञानवापी मस्जिद और श्रृंगार गौरी मामले से संबंधित एक प्रकरण में आज सुनवाई नहीं हो सकी। इस मामले में कोर्ट का आदेश आना था। ज्ञानवापी परिसर में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, पूरा परिसर हिंदुओं को सौंपने और वहां मिले आदि विश्वेश्वर महादेव के कथित शिवलिंग की पूजा-अर्चना की मांग पर सुनवाई टल गई।

इस मामले में दाखिल प्रार्थना पत्र पर सिविल जज फास्ट ट्रैक कोर्ट सीनियर डिवीजन महेंद्र कुमार पांडेय की अदालत में सुनवाई होनी थी। न्यायिक अधिकारी आज फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं बैठे इस कारण सुनवाई की अगली तिथि 14 नवंबर निर्धारित की गई है। मामले में ऑर्डर 7 रूल 11 पर पोषणीयता के बिंदु पर आदेश होना है। कोर्ट के आदेश से यह साफ होगा कि यह कि यह वाद सुनवाई योग्य है या नहीं।

एक नजर में पूरा मामला और कोर्ट में दिए गए तर्क

विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह विसेन की पत्नी किरन सिंह ने यह वाद दाखिल किया है। जिसमें ज्ञानवापी परिसर में मुस्लिमों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, पूरा ज्ञानवापी परिसर हिंदुओं को सौंपने और वहां मिले आदि विश्वेश्वर महादेव के कथित शिवलिंग की पूजा-अर्चना की मांग को लेकर दाखिल प्रार्थना पत्र सुनवाई पूरी हो चुकी है।

'जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि मस्जिद है या मंदिर'

वादिनी के अधिवक्ता मानबहादुर सिंह, शिवम गौड़ और अनुपम द्विवेदी ने दलील में कहा था कि वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस मुद्दे पर अंजुमन इंतजामिया की तरफ से जो आपत्ति उठाई गई है वह साक्ष्य व ट्रायल का विषय है। ज्ञानवापी का गुंबद छोड़कर सब कुछ मंदिर का है। जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि मस्जिद है या मंदिर।

दीन मोहम्मद के फैसले के जिक्र पर कहा था कि कोई हिंदू पक्षकार उस मुकदमे में नहीं था। यह भी दलील दी थी कि विशेष धर्म स्थल स्थल विधेयक 1991 इस वाद में प्रभावी नहीं है।स्ट्रक्चर का पता नहीं कि मंदिर है या मस्जिद।जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि मस्जिद है या मंदिर, जिसके ट्रायल का अधिकार सिविल कोर्ट को है।
 
कहा था कि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने और मस्जिद बनवाने का आदेश दिया था। वक्फ एक्ट हिंदू पक्ष पर लागू नहीं होता है। ऐसे में यह वाद सुनवाई योग्य है और अंजुमन की तरफ से पोषणीयता के बिंदु पर दिया गया आवेदन खारिज होने योग्य है। साथ ही राइट टू प्रॉपर्टी के तहत देवता को अपनी प्रॉपर्टी पाने का मौलिक अधिकार है। ऐसे में नाबालिग होने के कारण वाद मित्र के जरिए यह वाद दाखिल किया गया है। अदालत में वाद के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट की 6 रूलिंग और संविधान का हवाला भी दिया गया है।

मुस्लिम पक्ष की दलील

वहीं मुस्लिम पक्ष यानि अंजुमन इंतजामिया मसाजिद की तरफ से मुमताज अहमद, तौहीद खान, रईस अहमद, मिराजुद्दीन खान और एखलाक खान ने कोर्ट में प्रतिउत्तर में सवाल उठाते हुए कहा था कि एक तरफ कहा जा रहा है कि वाद देवता की तरफ से दाखिल है। वहीं दूसरी तरफ पब्लिक से जुड़े लोग भी इस वाद में शामिल हैं।

यह वाद किस बात पर आधारित है, इसका कोई पेपर दाखिल नहीं किया गया है और कोई सबूत नहीं है। कहानी से कोर्ट नहीं चलती, कहानी और इतिहास में फर्क है। जो इतिहास है वही लिखा जाएगा। साथ ही कानूनी नजीरे दाखिल कर कहा था कि वाद सुनवाई योग्य नहीं है और इसे खारिज कर दिया जाए।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

Join Our Whatsapp Group