Wednesday, November 30, 2022
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कुछ नहीं… सोचा बता दूं… वे अभिनेता से नेता और अब नीति निर्माता बनने चले हैं…

Actor to politician now policy maker : जया बच्चन अपनी नातिन को सलाह दे रही है, उससे याद आया… पहले बुरखे का समर्थन, और अब नातिन को यह सलाह ‘बिन शादी माँ बनो, दिक्कत नहीं… हेट स्‍पीच मामले में पद गंवाने और तीन साल की सजा पाने वाले आजम खान की हंसी रूक नहीं रही होगी, वो सोच रहा होगा कि मैंने तो सिर्फ कलर बताया था लेकिन ये जया ने तो अपनी नातिन को ही स्वच्छंदी जिंदगी जीने की सलाह दे दे डाली।

हमें जब कोई अभिनेता अच्छा लगता है उसका अभिनय अच्छा लगता है तो हम कभी कभी दैनिक दिनचर्या में उसकी नकल करने लगते हैं जैसे उसका हेयर स्टाइल कॉपी करना उसका पहनावा कॉपी करना उसने किस तरह से डायलॉग बोला है उस तरीके से बोलने की कोशिश करना बहुत कुछ इस तरह के बदलाव हमारे जीवन में आने लगते हैं। यही बड़ी वजह है कि कलाकारों को अपने प्रशंसकों के प्रति जिम्मेदारी का पता होना चाहिए कि वह किस तरह का बयान जारी कर रहे हैं, समाज में किस तरह की सोच पैदा कर रहे हैं।

कला जगत से जुड़े लोगों को कभी सीरियस नहीं लेना चाहिए। फालतू ही लोग उनको हीरो बनाते हैं। पुराने जमाने में ये प्रायः घुमक्कड़ होते थे, इन्हें गांव से बाहर रखा जाता था वहीं डेरा होता था। ड्योढ़ी लांघने भी नहीं देते थे। अपनी कला दिखाओ, इनाम लो और चलते बनो। समाज की रीति नीति में न ये सलाह देते थे न ही इनकी औकात होती थी। इनके पारस्परिक सम्बन्ध काफी कम्प्लिकेटेड होते थे जिसे वे अपनी कला पर हावी नहीं होने देते थे। समाज भी इनकी पर्सनल लाइफ में हस्तक्षेप नहीं करता था। गायक, नर्तक, करतबबाज, नट नटनियाँ वगैरह सभ्य समाज में घुलमिल नहीं हो पाती थी।

कोई ज्ञानी ध्यानी या योगी तपस्वी नहीं है कि प्रसिद्धि पचा लें

फ़िल्म कलाकार महमूद को ही ले ल‍िजीए जितनी बढ़िया हँसाने की एक्टिंग करता था, बाद में घर जाकर उतना ही रोता था। डिप्रेशन से बचने के लिए यह जरूरी होता है। बाद में वह मारिजुआना का एडिक्ट हुआ और अमरीका में दर्दनाक मौत हुई। ये लोग मनोरंजन करते हैं पेट पालने के लिए। विकृतियां स्वाभाविक है। कोई ज्ञानी ध्यानी या योगी तपस्वी नहीं है कि प्रसिद्धि पचा लें। अन्यथा नशा, वासना, अवैध संबंध, गाली गलौज और उटपटांग हरकतें इनकी फितरत है। अतः इनका डेरा नगर बस्ती से साइड में रखते थे, रात को दारू पीकर गाली गलौज करते, औरतों को पीटते सुबह जैसे थे वैसे! अतः इन्हें मान सम्मान या अधिक धन नहीं देना चाहिए अन्यथा वे समाज के महाजन बन जाते हैं और कुसंस्कारों से पीढ़ी को बर्बाद कर देते हैं। इनके छोटे-छोटे बच्चे भी वे हर वह नशा करते हैं जो दुनिया में है।

हमारे पूर्वजों ने सोच-समझ कर लिए थे निर्णय

हमारे पूर्वजों ने बहुत सोच-समझ कर ये निर्णय लिए थे कि एक मानव होने के नाते उनका भरपूर सम्मान करेंगे, उनकी आजीविका का भी प्रबंध करेंगे उनकी कला को पूरा प्रोत्साहन देंगे लेकिन घर परिवार के, सांस्कृतिक निर्णयों में उनकी कोई राय नहीं ली जाएगी। पूछा भी नहीं जाएगा। तो इनमें और बॉलीवुड के कलाकारों में केवल धन के आगमन के अलावा कोई भिन्नता नहीं है। कुछ दारू की थैली चूसकर कचरे के ढेर पर गिर जाते हैं और बॉलीवुड के कलाकार हशीश के सुड़के चेंप अपने फ्लैट या कार में गिरे रहते हैं। कोई बात नहीं, आप खाओ, पियो, व्यभिचार करो, तुम्हारी मजबूरी है, अच्छी कला के लिए यह सब चलेगा लेकिन प्लीज सलाह मत दो!!

नेता क्यों बने अभिनेता?

दक्षिण भारतीय अभिनेता प्रकाश राज ने ये बयान ऐसे समय पर दिया है जब कमल हासन ने राजनीति में उतरने की घोषणा की . प्रकाश राज ने कहा है, “किसी अभिनेता का नेता बनना मेरे देश का दुर्भाग्य है. मैं किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ रहा हूं. मैं अभिनेताओं के राजनीति में आने को सही नहीं मानता क्योंकि वे अभिनेता हैं और उनके प्रशंसक हैं. उन्हें अपने प्रशंसकों के प्रति ज़िम्मेदारी का पता होना चाहिए.” अपने समय और अपनी दुनिया को समझने के लिए सिनेमा जरूरी है, लेकिन अपने समय, और अपनी दुनिया में चलने के लिए राजनीति की समझ भी जरूरी है।

एक रिश्ता है, राजनीति और सिनेमा का

आमतौर पर कोई अभिनेता जब किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होता है, तो यही कहा जाता है कि चुनाव प्रचार में भीड़ जुटाने या किसी बड़े नेता के भाषण के पहले श्रोताओं का ध्यान खींचने के लिए राजनीतिक पार्टी ने अभिनेता को अपने साथ जोड़ा है। कई बार हम देखते हैं कि कल तक जिस अभिनेता की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही थी, आज वह अभिनेता – नेता बनकर हाथ जोड़े खड़ा है। एक रिश्ता है, राजनीति और सिनेमा का। आज से नहीं, अमेरिका में रोनाल्ड रीगन को याद कीजिए। उनके अभिनय की भी एक दुनिया थी, उनकी राजनीति के भी दिन थे। दक्षिण भारत में एम.जी. रामाचंद्रन, एन.टी. रामा राव और एम. करुणानिधि जैसे मशहूर अभिनेता और लोकप्रिय नेता की कहानी शोहरत की उस ड्योढ़ी पर शुरू होती है, जहां समर्थकों की भीड़ को राजनीति के सिक्के से तौलने के लिए कोई सपने लेकर आता है, तो कोई राजनीति के सिक्के लेकर। इस देश में ऐसे अभिनेताओं के कई उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों का उदाहरण लें तो दिलीप कुमार, देवानंद, सुनील दत्त, शबाना आजमी, राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया प्रदा, जया बच्चन, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, गोविंदा, परेश रावल, मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार अलग-अलग कारणों से और अलग-अलग काल में राजनीति में सक्रिय रहे। यहां राजनीतिक सक्रियता का मतलब सिर्फ चुनाव लड़ना भर नहीं है। सामाजिक कार्यों के लिए आगे आना और मंच से लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाना भी इसमें शामिल है। इस लिस्ट में और भी नाम हो सकते हैं।

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