Saturday, May 18, 2024
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हिंदी पत्रकारिता का 196 साल का गौरवमयी इतिहास से लेकर नैतिक मूल्य हनन तक सफर

!….खत्म होता चौथा स्तम्भ ?
दायित्व, कृतव्य, नैतिक मूल्य यह अब किताबी बातें रह गयी है। आजादी के पहले जब पत्रकारिता की नींव डली तो देश के प्रति कृतव्यनिष्ठता अपने दायित्व और नैतिक मूल्यों के आधार पर पत्रकारिता की जाती थी। पत्रकारिता का यह स्वर्णिम युग था जिसने बिना किसी अधिकारों के भी पत्रकारों को चौथा स्तम्भ माना गया। देश आजाद हुआ तो पत्रकारिता भी सत्ता के साथ चलकर देश की प्रगति का हिस्सा बनने लगी। सत्ता में दखलंदाजी किसी को नही सुहाती और अंततः तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगा दी। इमरजेंसी के दौर में जो भी छापना होता था पहले दिखाना पड़ता था फिर कांट छांट कर प्रकाशन करना पड़ता था।
इस दौर के बाद पत्रकारिता पर अंकुश लगता गया। इस अंकुश से पत्रकारिता में निखार आया और लोग पत्रकारों पर सत्ता से अधिक विश्वास करने लगे। यह वह दौर था जब एक चार लाइन के समाचार में कलेक्टर तक कि कुर्सी हिलने लगती थी। लेकिन 90 के दशक के बाद कारपोरेट सेक्टर हावी होने लगा और पत्रकारिता का व्यवसायीकरण होता गया। साल 2010 तक यही चलता रहा। इस दौरान भी संपादक नैतिक मूल्यों का ध्यान रखते थे। लेकिन 2010 के बाद निचले स्तर पर जिला स्तरों पर भी पत्रकारिता को कमाई के जरिये के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। यहीं से पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों का हनन होने लगा और आज चंद लोगों के कारण पत्रकारिता को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। आलम यह है कि पत्रकारिता में चापलूसी बढ़ने लगी। बात कड़वी जरूर है पर आज के दौर में पत्रकार देश हित जनहित की पत्रकारिता को नही खुद को बचाने की पत्रकारिता करने लगे है।
संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करने वाली धारा 19 का प्रयोग करने वाला हर व्यक्ति पत्रकार है। इसके लिए किसी के अधिकार पत्र द्वारा प्रमाणित करने की जरूरत नही है। संविधान का पालन करते हुए ईमानदारी से सत्ता को आईना दिखाना पत्रकारिता है। लेकिन क्या हुआ। आप राजगढ़ जिला ही देखें 18 अप्रैल को मैने कलेक्ट्रेट से फेसबुक लाइव दिखाया। हजारों लोगों ने देखा । सब जानते है लाइव में जो होता है वही दिखता है। लेकिन 4 मई को मेरी शिकायत की गई। मेरे द्वारा सीएम हेल्पलाइन का उपयोग किया गया और शपथपत्र एवं आवेदन से जांच की मांग की गई। मुझ पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए गए। में आज भी कहता हूं भृष्टाचार देख देख 2 सालों से कलेक्ट्रेट जाना ही बंद कर दिया था। 17 सितंबर 2021 को एक आवेदन भेजने के बाद में अहमदबाद चला गया था। 1 नवम्बर 2021 से पुनः कलेक्ट्रेट जाना शुरू किया। कलेक्ट्रेट में कैमरे लगे हुए है 1 नवम्बर से 4 अप्रैल 30 अप्रैल 2022 तक कि हर टेबल की रिकार्डिंग की जांच होना चाहिए। 4 मई को मेरे खिलाप झूठा आवेदन बाबुओं ने दिया। में गारंटी देता हूँ मेरे खिलाप एक भी बाबू एक छोटा सा भी सबूत पेश कर दे तो में उसी समय देह त्याग कर दूंगा। लेकिन मेरे द्वारा उजागर किए गए भृष्टाचार की फाइलों से घबराकर षड्यंत्र किया गया। में षड्यंत्रों से दूर रहना चाहता हूं। और उसी हथियार का इस्तेमाल किया गया। मैने उसी दिन से कलेक्ट्रेट ही नही राजगढ़ जाना भी छोड़ दिया।
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर में पत्रकारिता को त्यागकर आरटीआई एक्टिविस्ट की भूमिका में इंदौर से नया जीवन जीना शुरू करूँगा। एक साधारण मानव के लिए संविधान में दिए अधिकारों का उपयोग करते हुए भृष्टाचारियो की पोल खोलने में किसी संस्था का ठप्पा या पत्रकार होना जरूरी नही है। हर बात को न्यायालय की शरण मे ले जाइए न्यायालय हमेशा संविधान की रक्षा करता आया है। मेरी कर्मभूमि राजगढ़ जिले से दूर रहकर भी वही करूँगा जो नीति नियम नैतिकता कहती है।

माखन विजयवर्गीय की कलम से……

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