रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य का भावपूर्ण स्मरण

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नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन देश के प्रमुख साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य को याद किया गया।

‘स्मृति शेष स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य, प्रशासन, पत्रकारिता और फिल्म जगत से जुड़े वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व और रचनाओं पर भावपूर्ण संवाद किया। वक्ताओं ने श्री शुक्ल के साथ बिताए पलों और उनकी रचनाओं से जुड़े अनुभव साझा करते हुए उनके साहित्य को मानवीय संवेदना, मौलिक अभिव्यक्ति और सरल भाषा का अनुपम उदाहरण बताया।

परिचर्चा में प्रथम वक्ता आईएएस (सेवानिवृत्त) एवं साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी ने कहा कि वे 1973 से लगातार विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की हिंदी साहित्य परंपरा का जिक्र करते हुए ठाकुर जगमोहन सिंह, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय से लेकर विनोद कुमार शुक्ल तक की श्रृंखला को याद किया। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि श्री शुक्ल का लेखन पूरी तरह मौलिक है, किसी विचारधारा या कवि का अनुसरण नहीं किया। उनकी रचनाओं में साधारण मनुष्य पूरी गरिमा और संवेदना के साथ उपस्थित होता है। शोषितों का जीवन, खुद के गढ़े मुहावरे, सरल भाषा और गहरी अनुभूति उनकी रचनाओं की मुख्य विशेषता हैं। उनके उपन्यासों में ‘घर’ सबसे सुंदर और मानवीय प्रतीक के रूप में उभरता है।

नई दिल्ली की युवा कथाकार एवं पत्रकार आकांक्षा पारे ने कहा कि कई लोग उनकी रचनाओं को दुरूह मानकर खारिज कर देते हैं, लेकिन बहुत से पाठकों को इन्हीं रचनाओं से गहरा लगाव है। उन्होंने श्री शुक्ल को मनुष्यता के पुजारी बताया और कहा कि उनकी रचनाएं मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं।

जनसंपर्क विभाग के उप संचालक एवं युवा साहित्यकार सौरभ शर्मा ने कहा कि श्री शुक्ल का साहित्य सिखाता है कि सामान्य जीवन में भी मनुष्य कैसे खुश रह सकता है। वे बड़े लेखक होने के साथ उससे भी बड़े इंसान थे। उनके साथ बिताया समय सुकून देता था। उन्होंने बताया कि ‘स्मृति’ शब्द उनकी रचनाओं में बार-बार आता है और उनकी कृतियां पाठकों में कौतुक व उत्सुकता जगाती हैं।

राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं लेखक अनुभव शर्मा ने कहा कि श्री शुक्ल को पढ़ने के बाद उन्होंने उनके साहित्य को जिया है। उनकी रचनाओं के प्रतीक और बिंब रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देते हैं। ‘पेड़ों का हरहराना, चिड़ियों का चहचहाना’ जैसे छोटे प्रतीक उनकी कृतियों में हर जगह मौजूद हैं। उनकी कथाएं मिट्टी से उपजे शब्दों में अपनी बात कहती हैं और प्याज की तरह परत-दर-परत खुलती हैं।

अभिनेत्री टी.जे. भानु ने बताया कि साहित्य उन्हें बचपन से संबल देता रहा। श्री शुक्ल की पहली कविता पढ़कर लगा कि यही वे बातें हैं जो वे खुद कहना चाहती थीं। वे हर वर्ष 1 जनवरी को उनके जन्मदिन पर रायपुर आती थीं और उनसे मिलती थीं। उनकी किताबों में जनमानस की सच्ची और आत्मीय बातें हैं।

परिचर्चा की सूत्रधार डॉ. नीलम वर्मा ने समापन में कहा कि स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य की एक नहीं, अनेक खिड़कियां हैं। उनकी रचनाओं में गहरी मानवीय करुणा और संवेदना है। वे किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को जोड़ते हैं।