उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आज भी सदियों पुरानी परंपराएं जीवित हैं, जो हमें प्रकृति और ईश्वर से जोड़ती हैं. यहां किसी भी शुभ कार्य या गृह प्रवेश के दौरान घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण (वंदनवार) लगाना अनिवार्य माना जाता है. पंडित हेम चन्द्र पाठक के अनुसार, ये पत्ते केवल सजावट नहीं बल्कि एक सुरक्षा कवच हैं, जो घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखकर सुख-समृद्धि लाते हैं. जानिए क्यों यहां आम के पत्तों के बिना हर मांगलिक कार्य अधूरा माना जाता है और इसे लगाने के सही नियम क्या हैं.
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों खासकर बागेश्वर और आसपास के इलाकों में देवताओं के स्वागत के लिए घर के द्वार पर विशेष पत्ते लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसमें आम के पत्तों का सबसे अधिक उपयोग होता है. जब भी कोई शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या गृह प्रवेश होता है, तो द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बांधा जाता है. इसे देव आमंत्रण का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है कि हरे पत्ते जीवन, समृद्धि और ताजगी का संदेश देते हैं. यह परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ाव का संकेत मानी जाती है.
पंडित हेम चन्द्र पाठक के अनुसार आम के पत्ते नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने वाले माने जाते है. धार्मिक मान्यता कहती है कि हरे और ताजे पत्तों में सकारात्मक कंपन होते हैं, जो वातावरण को शुद्ध रखने में मदद करते हैं. जब इन्हें घर के मुख्य द्वार पर लगाया जाता है, तो यह बाहर से आने वाली अशुभ शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों को रोकने का कार्य करते हैं. पहाड़ में लोग आज भी किसी भी मांगलिक कार्य से पहले पत्तों का तोरण लगाना नहीं भूलते है. इसे आध्यात्मिक सुरक्षा कवच की तरह देखा जाता है.
गृह प्रवेश के समय आम के पत्तों का उपयोग विशेष रूप से जरूरी माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार नया घर केवल ईट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि ऊर्जा का केंद्र होता है. ऐसे में प्रवेश से पहले द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बांधने से शुभ ऊर्जा का प्रवेश होता है. पंडित हेम चन्द्र पाठक बताते हैं कि आम का वृक्ष देवप्रिय माना गया है. इसके पत्ते मंगल कार्यों में अनिवार्य माने गए हैं. गृह प्रवेश के समय कलश में भी आम के पत्ते रखे जाते हैं. यह सुख, शांति और धन-धान्य की वृद्धि का प्रतीक है.
आम के पत्तों का तोरण बांधते समय कुछ नियमों का ध्यान रखना जरूरी है. पत्ते हमेशा ताजे और हरे होने चाहिए. सूखे या फटे पत्तों का उपयोग नहीं करना है. पत्तों की संख्या विषम रखी जाती है, जैसे 5, 7 या 9। इन्हें धागे या मौली में बांधकर मुख्य द्वार के ऊपर लगाया जाता है. पत्तों का मुख नीचे की ओर होना शुभ माना जाता है. पंडित पाठक के अनुसार तोरण बांधते समय मन में शुभ संकल्प और देव स्मरण करना चाहिए. यह केवल सजावट नहीं बल्कि एक धार्मिक प्रक्रिया मानी जाती है.
हिंदू पूजा पद्धति में कलश स्थापना का विशेष महत्व है. इसमें आम के पत्तों का प्रयोग जरूरी माना जाता है. कलश में जल भरकर उसके मुख पर आम के पत्ते रखे जाते हैं. ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है. यह व्यवस्था पंचतत्व और जीवन ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है. पहाड़ में होने वाली पूजा, हवन और व्रत अनुष्ठानों में यह विधि आम है. पंडित हेम चन्द्र पाठक के अनुसार आम के पत्ते देवताओं को प्रिय हैं. इनके बिना कलश अधूरा माना जाता है. यह व्यवस्था घर में सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना के साथ की जाती है.
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ आम के पत्तों के उपयोग को कुछ लोग वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपयोगी मानते हैं. हरे पत्ते वातावरण में ताजगी का अहसास कराते हैं. प्राकृतिक सजावट का काम करते हैं. पुराने समय में जब कृत्रिम सजावटी सामग्री उपलब्ध नहीं थी, तब लोग प्राकृतिक चीजों का ही उपयोग करते थे. आम के पत्ते लंबे समय तक ताजे बने रहते हैं, इसलिए तोरण के लिए उपयुक्त माने गए. ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी पर्यावरण अनुकूल सजावट को प्राथमिकता दी जाती है. इस तरह यह परंपरा प्रकृति संरक्षण के संदेश से भी जुड़ी हुई है.
आम के पत्तों का उपयोग केवल गृह प्रवेश में ही नहीं, बल्कि कई अन्य शुभ अवसरों पर भी किया जाता है. जैसे नामकरण संस्कार, विवाह, यज्ञ, व्रत, त्योहार और देव पूजा के समय द्वार सजाने की परंपरा है. पहाड़ में देवी-देवताओं की पूजा के दौरान मंदिर और घर दोनों स्थानों पर पत्तों का तोरण लगाया जाता है. इसे शुभ सूचना और मंगल कार्य की पहचान भी माना जाता है. गांवों में आज भी जब किसी घर में बड़ा धार्मिक आयोजन होता है, तो सबसे पहले द्वार सजाया जाता है. यह संकेत होता है कि घर में पवित्र कार्य चल रहा है.
पंडित हेम चन्द्र पाठक के अनुसार आम के पत्तों के उपयोग में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं. कभी भी सूखे, पीले या गिरे हुए पत्ते उपयोग में नहीं लाने चाहिए. पूजा के बाद पुराने पत्तों को अपवित्र स्थान पर नहीं फेंकना चाहिए, बल्कि पेड़ की जड़ या साफ स्थान पर रखना उचित माना गया है. तोरण को बहुत लंबे समय तक सड़ने की स्थिति में नहीं छोड़ना चाहिए, समय पर बदल देना चाहिए. प्लास्टिक के कृत्रिम पत्तों की जगह असली पत्तों का उपयोग करना ज्यादा शुभ माना गया है. नियम और श्रद्धा के साथ किया गया. यह छोटा सा कार्य भी बड़ा मंगल फल देने वाला माना जाता है.








