Chhattisgarh के आदिवासियों की अनोखी परंपरा, जहां ‘मठ बांधना’ और ‘कड़साल’ के साथ आत्मा को दी जाती है विदाई

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Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के औंधी क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पालेभट्टी में आदिवासी समाज आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को उसी श्रद्धा, अनुशासन और सामूहिक भावना के साथ निभा रहा है. यहां किरंगे परिवार द्वारा हाल ही में संपन्न एक पारंपरिक अनुष्ठान ने क्षेत्र का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें ‘मठ बांधना’ और ‘कड़साल’ की अनूठी परंपरा पूरी आस्था के साथ निभाई गई.

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की अनोखी परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को सीधे विदा नहीं किया जाता, बल्कि विशेष विधि-विधान के साथ उसे पूर्वजों की श्रेणी में स्थान दिया जाता है. इस प्रक्रिया की शुरुआत श्मशान घाट से होती है. मांदर और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप के साथ परिजन श्मशान पहुंचते हैं, जहां मृतक की आत्मा के लिए पूजा-पाठ कर उसे प्रतीकात्मक रूप से अपने साथ लेकर गांव की ओर प्रस्थान करते हैं.

गांव लौटते समय बीच रास्ते में पूर्वजों की आत्माओं से ‘भेंट’ कराने की परंपरा निभाई जाती है. इसे जीवन और मृत्यु के मध्य सेतु का प्रतीक माना जाता है. इसके बाद सभी आत्माओं को एक स्थान पर एकत्रित कर पूरे सम्मान के साथ घर लाया जाता है. आंगन या निर्धारित स्थल पर ‘मठ’ बांधा जाता है, जो आत्मा के स्वागत और पूर्वजों में सम्मिलित करने का प्रतीक है. परिवार के बुजुर्ग और समाज के प्रमुखजन पूजा-अर्चना कर आत्मा की शांति तथा परिवार की समृद्धि की कामना करते हैं.
इस अवसर पर किरंगे परिवार के 16 दिवंगत सदस्यों की आत्माओं को एक साथ स्थापित कर सामूहिक रूप से सम्मान दिया गया.

यह दृश्य सामाजिक एकजुटता और पूर्वजों के प्रति गहरे सम्मान का प्रतीक था. वहीं एक अविवाहित बहन, जिनका निधन विवाह से पूर्व हो गया था, उनकी आत्मा को परंपरा के अनुसार अलग स्थान पर रखा गया. समाज की मान्यता के अनुसार, अविवाहित बेटी को दूसरे कुल का माना जाता है, इसलिए उसे परिवार की सामूहिक आत्माओं में सम्मिलित नहीं किया गया, बल्कि सम्मानपूर्वक अलग स्थान प्रदान किया गया.

मठ बांधना’ और ‘कड़साल’ के साथ आत्माओं को देते हैं विदाई

अनुष्ठान के उपरांत ‘कड़साल’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जो इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रात भर मांदर, ढोल और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते रहे। गीतों में पूर्वजों का स्मरण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन-मृत्यु के शाश्वत चक्र को स्वीकार करने का भाव स्पष्ट झलकता रहा. गांव के बुजुर्गों का कहना है कि ‘कड़साल’ केवल शोक का अवसर नहीं, बल्कि आत्मा को सम्मानपूर्वक पूर्वजों से जोड़ने और समुदाय को एक सूत्र में बांधने की सामाजिक प्रक्रिया है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी है, जहां वे अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं को प्रत्यक्ष रूप से सीखते हैं.

आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद पालेभट्टी जैसे गांवों में यह परंपरा आज भी जीवंत है. ‘मठ बांधना’ और ‘कड़साल’ जैसी विधाएं न केवल छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित कर रही हैं, बल्कि सामाजिक एकता, सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त संदेश भी दे रही हैं.