Assam में BJP की जीत की हैट्रिक या कांग्रेस का सूखा जारी?

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नई दिल्ली। पूर्वोत्तर (Northeast) के सबसे अहम राज्य असम (Assam Elections 2026) में भाजपा (BJP) के सामने जीत की हैट्रिक लगाने, कांग्रेस के सामने जीत का सूखा खत्म करने और एआईयूडीएफ के सामने किंगमेकर बनने की चुनौती है। इस बार भी अहम मुद्दा अवैध घुसपैठ (Illegal Intrusion) के कारण जनसांख्यिकी में हुए बदलाव, लाखों की संख्या में अवैध अप्रवासी और चाय बगान की दुर्दशा है। जीत की रात तलाश रहे कांग्रेस ने पहले ही उम्मीदवारों की दो सूची जारी की है।

राज्य के सीएम रहे दिवंगत तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई (Gaurav Gogoi) को जोरहाट से उतारा गया है। साथ ही, नई रणनीति के तहत गठबंधन सहयोगी एआईयूडीएफ से दूरी बना ली है। इसकी जगह पार्टी ने असम जातीय परिषद, ऑल इंडिया हिल लीडर्स कांफ्रेंस और माकपा समेत 10 दलों से गठबंधन किया है। दूसरी ओर भाजपा ने पुराने साथी असम गण परिषद के अलावा बोडोलैंड में मजबूती के लिए नए साथी के रूप में बीपीएफ से गठबंधन किया है।

टूटा मुस्लिम वर्चस्व का मिथक
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के इर्द-गिर्द घूम रही असम की राजनीति दशकों तक मुस्लिम मतों (35%) के ध्रुवीकरण पर टिकी रही। हालांकि 2016 और 2021 में भाजपा ने बहुसंख्यकों का समानांतर ध्रुवीकरण कर इस वर्चस्व को तोड़ने में सफलता हासिल की। पार्टी ने असम गण परिषद, यूपीपीएल जैसे दलों को साधा और एनडीए को धमाकेदार जीत दिलवाई। भाजपा ने उग्र हिंदुत्व और महिला को हथियार बनाया है। हिमंता सरकार ने 37 लाख महिलाओं को 8000 रुपये की सहायता दी है। इसके अलावा घुसपैठ पर सीएम के बयान पूरे पांच साल तक राज्य ही नहीं, देशभर में चर्चा का विषय बने हैं।

अपर असम भाजपा की ताकत
बीते दोनों ही चुनावों में अपर असम के नौ जिले की 43 सीटें भाजपा के लिए सत्ता की सीढ़ी साबित हुई। बीते चुनाव में पार्टी को 38 तो उससे पहले 37 सीटें हासिल हुई। इस क्षेत्र में पूर्व सीएम सर्बानंद सोनोवाल की गहरी पैठ है, जिनके वर्तमान सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के साथ मतभेद की चर्चा है। खतरा भांप शीर्ष नेतृत्व ने सोनोवाल को मतदान तक अपर असम में डटे रहने और हिमंता को आक्रामक बयान से परहेज बरतने का निर्देश दिया है।

परिसीमन के बाद पहला चुनाव, बदला सियासी गणित
असम में परिसीमन के बाद पहला विधानसभा चुनाव है। नई सीमाओं और बदले सामाजिक समीकरणों के बीच 126 सीटों का सियासी गणित पहले से अलग नजर आ रहा है। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा व कांग्रेस के बीच मुकाबला पहले से अधिक रोचक माना जा रहा है। कई क्षेत्रों में मतदाताओं का स्वरूप बदल गया है, इससे पुराने समीकरण भी बदलते दिख रहे हैं। परिसीमन के बाद राज्य 9 सीटें अनुसूचित जाति और 19 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। नई सीमाओं के कारण कुछ सामान्य सीटें आरक्षित श्रेणी में चली गई हैं, जबकि कुछ आरक्षित सीटें सामान्य हो गई हैं।

क्षेत्रीय संतुलन भी बदल गया
नई सीमाओं के बाद अपर असम, लोअर असम और बराक घाटी के बीच सीटों का संतुलन भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। अपर असम के जिलों में सीटों की सीमाएं बदलने से यहां भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, जबकि लोअर असम और बराक घाटी में विपक्षी दलों की पकड़ को लेकर भी चर्चा हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में पहली बार अलग तरह का सामाजिक समीकरण दिखाई देगा। इससे कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय भी हो सकता है।