UAE के बाहर होने के बाद ओपेक प्लस का अहम फैसला, उत्पादन बढ़ाने का ऐलान

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संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के ओपेक प्लस से अलग होने के तुरंत बाद तेल उत्पादक देशों के समूह ने कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बड़ा कदम उठाया है। रविवार को हुई बैठक में समूह के सात प्रमुख देशों ने जून महीने से प्रतिदिन 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त तेल बाजार में उतारने का निर्णय लिया है। यूएई की विदाई के बाद ओपेक प्लस ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि संगठन की एकता और बाजार पर उसकी पकड़ अब भी मजबूत है। हालांकि, कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि केवल एक रणनीतिक संदेश है, क्योंकि समूह के कई देश बुनियादी ढांचे की कमी के चलते पहले से ही अपने निर्धारित लक्ष्य से कम उत्पादन कर रहे हैं। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह खबर राहत भरी हो सकती है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के अचानक बढ़ने का खतरा कम हो जाएगा।

क्षेत्रीय तनाव और आपूर्ति की बाधाएं

मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल व्यापार की दिशा बदल दी है। फरवरी के अंत में ईरान पर हुए हमलों के बाद जवाब में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी करने से खाड़ी देशों से होने वाला निर्यात संकट में पड़ गया है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बाधित होने से खाड़ी देशों की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता चाहकर भी वैश्विक बाजारों तक नहीं पहुंच पा रही है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी इस सैन्य गतिरोध ने न केवल आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ा है, बल्कि कच्चे तेल के सुरक्षित परिवहन पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारी मात्रा में आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है, जिसके कारण ओपेक प्लस के इस निर्णय का देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ना तय है। यूएई के समूह से हटने और ओपेक द्वारा उत्पादन बढ़ाए जाने के बीच संतुलन बनने से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के स्थिर रहने की उम्मीद बढ़ गई है। यदि बाजार में तेल की उपलब्धता बनी रहती है, तो मुद्रास्फीति पर नियंत्रण पाना सरकार के लिए आसान होगा, जिससे आम उपभोक्ताओं को भी वैश्विक उथल-पुथल के बीच राहत मिल सकती है।

ईरानी तेल क्षेत्र में गहराता संकट

अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के चलते ईरान को अपने तेल उत्पादन में बड़ी कटौती करने पर मजबूर होना पड़ा है। निर्यात के रास्ते बंद होने के कारण ईरान के भंडारण केंद्र पूरी तरह भर चुके हैं और उसके प्रमुख टर्मिनलों पर टैंकरों की कतारें लग गई हैं। ईरानी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वे भंडारण क्षमता पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए उत्पादन में लगभग तीस प्रतिशत तक की कमी कर रहे हैं। अमेरिका की ओर से ऊर्जा आय को रोकने की रणनीति ने ईरान के तेल उद्योग को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां उसे अपनी व्यवस्था बचाए रखने के लिए उत्पादन घटाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा है।