कोलकाता | पश्चिम बंगाल की राजनीति में 9 मई 2026 की तारीख एक बड़े बदलाव के रूप में दर्ज होने जा रही है। विधानसभा चुनावों में 207 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा ने पहली बार राज्य की सत्ता पर कब्जा किया है। शुक्रवार को हुई विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से शुभेंदु अधिकारी को नेता चुना गया, जो अब राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। यह जीत न केवल भाजपा के वैचारिक विस्तार की परिणति है, बल्कि शुभेंदु अधिकारी के उस कड़े संघर्ष का प्रतिफल भी है, जो उन्होंने 2020 में तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के बाद शुरू किया था।
राजनीतिक विरासत और जमीनी संघर्ष का मेल
15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर में जन्मे शुभेंदु अधिकारी एक रसूखदार सियासी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और मेदिनीपुर क्षेत्र में इस परिवार का प्रभाव इतना गहरा है कि इन्हें वहां का 'सियासी सम्राट' कहा जाता है। शुभेंदु ने अपने करियर की शुरुआत 1995 में कांग्रेस से की थी, लेकिन 1998 में वे ममता बनर्जी के साथ टीएमसी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हो गए। 2007 का नंदीग्राम आंदोलन उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, जिसने वामपंथ के 34 साल पुराने किले को ढहाने में मुख्य भूमिका निभाई और शुभेंदु को टीएमसी में नंबर-2 के कद तक पहुँचा दिया।
टीएमसी से विद्रोह और 'जायंट किलर' की छवि
एक समय ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद रहे शुभेंदु का मोहभंग तब शुरू हुआ जब पार्टी में अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का दखल बढ़ने लगा। खुद को उपेक्षित महसूस करने के बाद उन्होंने 2020 में नाटकीय अंदाज में कैबिनेट और पार्टी से इस्तीफा दे दिया। 19 दिसंबर 2020 को गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में वे भाजपा में शामिल हुए। 2021 के चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट पर सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनौती दी और उन्हें हराकर 'जायंट किलर' का खिताब हासिल किया। इसी जीत ने भाजपा के भीतर उनके कद को इतना ऊंचा कर दिया कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
2026 की जीत के मुख्य शिल्पकार और भावी विजन
2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के पीछे शुभेंदु अधिकारी की सोची-समझी रणनीति रही है। उन्होंने न केवल भ्रष्टाचार, संदेशखाली और आरजी कर जैसे मुद्दों पर टीएमसी सरकार को घेरा, बल्कि सीएए और घुसपैठ जैसे विषयों पर मुखर होकर पार्टी के आधार को मजबूत किया। इस बार उन्होंने ममता बनर्जी को उनकी पारंपरिक सीट भवानीपुर में भी पटखनी देकर यह साबित कर दिया कि बंगाल की जनता अब बदलाव चाहती है। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी को बंगाल में विकास, सुरक्षा और सुशासन के एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।









