25 दिन 25 कहानियां: बनारस की गलियों में अब पहले जैसी सुस्ती नहीं

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वाराणसी। गंगा की लहरें वही हैं, घाटों का वैभव वही है और सीढ़ियों का विस्तार भी वही है, मगर इन घाटों पर वक्त गुजारने का अंदाज पूरी तरह बदल चुका है। अब लोग यहाँ सुकून के पल जीने कम, बल्कि दुनिया को दिखाने ज्यादा आते हैं। कभी तस्वीरें यादों को सहेजने के लिए क्लिक होती थीं, आज सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए खींची जाती हैं। पहले लोग सच्चे दोस्त बनाते थे, अब सिर्फ फॉलोअर्स की गिनती होती है। चाय की अड़ियों पर होने वाले गम्भीर विमर्श अब सिमटने लगे हैं और चेहरों पर स्मार्टफोन की कृत्रिम रोशनी हावी हो गई है। घाटों पर हुजूम तो पहले से कहीं बड़ा है, लेकिन आपसी संवाद की वह खनक अब गायब है। यह बदलाव केवल काशी का नहीं, बल्कि बदलते दौर की हकीकत है।

एक जमाना था जब बनारस का मतलब सिर्फ शिवालय, तंग गलियां और घाट नहीं, बल्कि बेफिक्री और फुर्सत का अहसास था। यहाँ लोग किसी खास मकसद से नहीं, बस यूँ ही घूमने निकल पड़ते थे। किसी को भी कहीं पहुँचने की कोई आपाधापी नहीं होती थी। जैसे ही सांझ ढलती, लोगों के कदम खुद-ब-खुद अस्सी, लंका, विश्वनाथ मंदिर (VT) और गंगा किनारे की तरफ मुड़ जाते थे। तब मुलाकातें पहले से तय नहीं होती थीं, बस राह चलते हो जाया करती थीं।

अ informal पार्लियामेंट थीं घाटों की सीढ़ियां

घाटों की ये सीढ़ियां और कुल्हड़ वाली चाय की दुकानें किसी खुली संसद जैसी हुआ करती थीं। किसी कोने में देश की सियासत पर गरमागरम बहस छिड़ी होती, तो कहीं कोई रिसर्च स्कॉलर अपने प्रोफेसर की शिकायत कर रहा होता। कोई दिल टूटने के बाद जिंदगी का फलसफा समझा रहा होता, तो कोई अपनी नई नज़्म सुनाकर महफिल लूट रहा होता। अगर आप वहाँ महज पाँच मिनट के लिए ठहर जाएं, तो कोई न कोई परिचित आवाज़ गूँज उठती थी—"आवा गुरु, इहंवा बइठा!" यही बनारस का असली मिजाज था, जहाँ अजनबी को भी अपना बनते देर नहीं लगती थी।

उस दौर में अस्सी घाट कोई व्यावसायिक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पूरे शहर का एक साझा बैठकखाना था। कोई पुराना अखबार हाथ में लिए बैठा रहता, कोई मौन रहकर गंगा की धारा को निहारता, तो कोई बिना मांगे ही अध्यात्म का पाठ पढ़ा देता। घाट पर बैठे बुजुर्गों की टोली, चाय वाले की सुरीली आवाज़, नावों का आना-जाना और गंगा का वह असीम ठहराव, सब मिलकर मन के सारे बोझ को पल भर में हल्का कर देते थे।

बीएचयू और लंका की वो बेफिक्र शामें

काशी की इस बेसाख्ता फुर्सत को करीब से महसूस करना हो, तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की शामें याद आती हैं। लंका से लेकर विश्वनाथ मंदिर तक जाने वाली सड़कें, हॉस्टलों के बाहर चाय के ठिकानों पर जमने वाला रंग और विभागों के बाहर घंटों चलने वाले वैचारिक मतभेद, इसी अनूठी संस्कृति के प्रतीक थे। यहाँ शिक्षा सिर्फ क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं थी, बल्कि चाय की चुस्कियों, हॉस्टल के कमरों और लंबी पैदल सैर के दौरान सीखी जाती थी।

तब मोबाइल फोन जेब की शोभा बढ़ाते थे, हाथों की कमान नहीं। लोग स्क्रीन को स्क्रॉल करने के बजाय एक-दूसरे की आँखों में झांकते थे। चाय की दुकानों पर सिर्फ खाता नहीं, बल्कि अटूट भरोसा चलता था। कई बार तो जेब खाली होने पर "पैसे बाद में दे देना" कहकर दुकानदार एक प्यारी सी मुस्कान दे देता था। बनारस का यह गणित पूरी दुनिया से जुदा था—यहाँ पैसों से ज्यादा पहचान की कीमत थी। भीड़ के बीच भी कभी कोई तन्हा नहीं होता था, क्योंकि यहाँ अकेलापन भी महफिल का हिस्सा बन जाता था।

रफ़्तार की दुनिया में धीमे होने की आस

मगर वक्त के थपेड़ों ने इस शहर की रफ़्तार बदल दी। घाट, सीढ़ियां और गंगा आज भी यथावत हैं, लेकिन वहाँ बैठने का सलीका बदल गया है। शिकायत किसी और शहर से नहीं बल्कि बनारस से इसलिए है, क्योंकि इस शहर से हर किसी का लगाव बहुत गहरा है। जब पूरी दुनिया अंधी दौड़ में भाग रही थी, तब यह शहर ठहरकर खुद से रूबरू होने का जरिया था। आज भी अस्सी की पुरवाई में वही पुराना अहसास है और गंगा उसी धीरज के साथ बह रही है। बस इंतज़ार इस बात का है कि बनारस अपनी इस डिजिटल रफ़्तार को थोड़ा धीमा करे, ताकि चाय भले ही थोड़ी फीकी हो जाए, लेकिन अपनों के बीच की बातचीत की मिठास हमेशा बनी रहे।