नई दिल्ली। भारत की समुद्री परमाणु क्षमता और रणनीतिक सैन्य ताकत को लेकर एक बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक तस्वीर सामने आई है। 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' (IISS) द्वारा जारी की गई नई सेटेलाइट इमेजरी में भारतीय नौसेना की सभी चार अरिहंत क्लास न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) विशाखापट्टनम बंदरगाह पर एक साथ खड़ी नजर आ रही हैं। यह पहला मौका है जब देश के इस परमाणु बेड़े की सभी पनडुब्बियों को एक साथ पियरसाइड (डॉक पर) देखा गया है, जो हिंद महासागर और वैश्विक पटल पर भारत के मजबूत होते 'समुद्री न्यूक्लियर डिटरेंस' (परमाणु प्रतिरोधक क्षमता) की गवाही दे रहा है।
तस्वीर में दिखे नौसेना के 'चार सारथी'
सेटेलाइट से ली गई इन तस्वीरों में भारतीय नौसेना की अत्याधुनिक और घातक पनडुब्बियों का पूरा कुनबा एक साथ दिखाई दे रहा है:
आईएनएस अरिहंत (S2): भारत की पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी, जो वर्ष 2018 में अपनी पहली सफल गश्त (डिटरेंस पेट्रोल) पूरी कर इतिहास रच चुकी है।
आईएनएस अरिघात (S3): इस श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी, जो नौसेना के बेड़े में शामिल होकर अपनी सेवाएं दे रही है।
आईएनएस अरिदमन (S4): अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी, जो आधुनिक तकनीकी बदलावों से लैस है।
चौथी पनडुब्बी (S4*): इस श्रेणी की चौथी न्यूक्लियर पनडुब्बी, जिसका नाम संभावित रूप से आईएनएस अरिसूदन होने वाला है।
लॉन्च ट्यूब और मिसाइल-डिजाइन में बड़ा बदलाव
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, जैसे-जैसे इस बेड़े का विस्तार हो रहा है, भारत अपनी पनडुब्बियों की मारक क्षमता और डिजाइन में भी बड़ा अपग्रेड कर रहा है:
लॉन्च ट्यूब की क्षमता दोगुनी: पहली दो पनडुब्बियों (अरिहंत और अरिघात) में जहां केवल 4 लॉन्च ट्यूब दिए गए हैं, वहीं नई आईएनएस अरिदमन और S4* पनडुब्बी में इसकी क्षमता बढ़ाकर 8 लॉन्च ट्यूब कर दी गई है।
3500 किमी तक अचूक निशाना: शुरुआती पनडुब्बियों में कम दूरी (700 किमी) वाली के-15 मिसाइलें थीं, लेकिन नई पनडुब्बियों को अत्याधुनिक के-4 बैलिस्टिक मिसाइल से लैस किया जा रहा है। इसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर है, जो भारतीय नौसेना को समुद्र के किसी भी सुरक्षित कोने में छिपकर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की ताकत देती है।
न्यूक्लियर ट्रायड और 'सेकंड स्ट्राइक' की अचूक गारंटी
सामरिक दृष्टि से एसएसबीएन (SSBN) पनडुब्बियों को भारत के 'न्यूक्लियर ट्रायड' (जमीन, हवा और पानी से परमाणु हमला करने की क्षमता) का सबसे सुरक्षित और मजबूत स्तंभ माना जाता है। गहरे समंदर में छिपी होने के कारण दुश्मन के लिए इन्हें ढूंढ पाना लगभग नामुमकिन होता है। भारत की 'नो फर्स्ट यूज' (पहले परमाणु हमला न करने की नीति) के तहत ये पनडुब्बियां बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यदि दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला कर भी दे, तो ये समंदर के भीतर से 'सेकंड स्ट्राइक' (पलटवार) करके दुश्मन को पूरी तरह तबाह कर सकती हैं।
सुरक्षा के लिए बन रहा नया अंडरग्राउंड बेस 'आईएनएस वर्षा'
विशेषज्ञों का कहना है कि चारों पनडुब्बियों का एक साथ बंदरगाह पर दिखना यह संकेत देता है कि भारत अभी निरंतर समुद्री गश्त (कंटीन्यूअस पेट्रोलिंग) के पूर्ण चक्र को लागू करने की प्रक्रिया में है। जब ये चारों पूरी तरह ऑपरेशनल मोड में आ जाएंगी, तब कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी हमेशा समंदर की गहराइयों में तैनात रहेगी। इसके साथ ही, अपनी गोपनीयता और सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करने के लिए भारत विशाखापट्टनम से 50 किलोमीटर दक्षिण में 'आईएनएस वर्षा' नामक एक बेहद सुरक्षित और अत्याधुनिक अंडरग्राउंड पनडुब्बी बेस का निर्माण भी तेजी से कर रहा है।









