कोलकाता। पश्चिम बंगाल की नवगठित भाजपा सरकार ने राज्य में ओबीसी (OBC) आरक्षण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला लिया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मई 2024 के ऐतिहासिक आदेश का अनुपालन करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक नई अधिसूचना जारी की है। इसके तहत राज्य में पूर्ववर्ती सरकार द्वारा बढ़ाई गई ओबीसी आरक्षण सूची को निरस्त कर दिया गया है। इस नए फैसले से राज्य में अब ओबीसी आरक्षण का कोटा घटकर 17 प्रतिशत से 7 प्रतिशत रह गया है, जिसने बंगाल के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।
नया फॉर्मूला: केवल 66 समुदायों को मिला ओबीसी दर्जा
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अब राज्य में केवल वही व्यवस्था प्रभावी होगी जो वर्ष 2010 से पहले लागू थी:
2010 से पहले की सूची वैध: सुवेंदु सरकार ने उन 66 समुदायों को नियमित (Regularise) कर दिया है, जो वर्ष 2010 से पहले राज्य की ओबीसी आरक्षण सूची में शामिल थे। इन समुदायों को सरकारी सेवाओं, पदों और वर्तमान में चल रही शैक्षणिक दाखिला प्रक्रियाओं (Admissions) में 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा।
शामिल प्रमुख जातियां: इस वैध सूची में कपाली, बैश्य कपाली, कुर्मी, नाई (नेपित), तांती, सूत्रधार, कर्मकार, कुंभकार, स्वर्णकार, तेली, योगी, गोआला, गोप, अहीर, यादव, मोइरा, मोदक, बारुजीबी, सातचासी, मालाकार, खंडैत और तुरहा जैसे पारंपरिक और सामाजिक समुदाय शामिल हैं।
मुस्लिम और ईसाई चेहरों को जगह: इस 66 समुदायों की पुरानी सूची में कुछ ऐसे वर्ग भी शामिल हैं जो मुस्लिम हैं, जैसे- कसाई (कुरैशी), हज्जाम (मुस्लिम), चौदुली, पहाड़िया मुस्लिम और जोला (अंसारी-मोमीन)। इसके अतिरिक्त, जिन व्यक्तियों ने अनुसूचित जातियों (SC) से ईसाई धर्म अपनाया है, उन्हें और उनके वंशजों को भी इस सूची में स्थान दिया गया है।
क्यों घटा आरक्षण का दायरा? समझिए कानूनी गणित
यह पूरी कार्रवाई कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले के तहत की गई है, जिसने आरक्षण के तत्कालीन ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए थे:
अधिनियम 2012 के प्रावधान निरस्त: कलकत्ता हाई कोर्ट ने ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012’ के तहत जोड़ी गईं कई नई श्रेणियों को अवैध करार देते हुए समाप्त कर दिया था।
कैटेगरी-वार ढांचा खत्म: अदालत ने पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा तैयार किए गए श्रेणी-वार (Category-wise) आरक्षण ढांचे को भी खत्म कर दिया था। पुरानी व्यवस्था में OBC-A (अधिक पिछड़े वर्ग) के लिए 10 प्रतिशत और OBC-B (पिछड़े वर्ग) के लिए 7 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित था, जिससे कुल कोटा 17 प्रतिशत पहुंच गया था। न्यायालय के इस आदेश के बाद अब श्रेणियों का यह अंतर समाप्त हो गया है और कुल ओबीसी आरक्षण केवल 7 प्रतिशत तक सीमित हो गया है।
वोट बैंक की राजनीति बनाम पारदर्शिता: छिड़ी राजनीतिक रार
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में बहस बेहद तेज हो गई है: भाजपा सरकार का तर्क है कि 2010 से पहले लागू सूची पर कभी कोई न्यायिक आपत्ति नहीं आई थी क्योंकि वह सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के ठोस आंकड़ों और कानूनी जांच के बाद तैयार की गई थी। सरकार के अनुसार, इस पुरानी व्यवस्था को दोबारा लागू करने का मुख्य उद्देश्य तुष्टिकरण को रोकना और आरक्षण प्रणाली को कानूनी रूप से मजबूत व पारदर्शी बनाना है।
मुस्लिम उप-समूहों पर कैंची: पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार की सूची में कुल 140 उप-समूह शामिल थे, जिनमें से 80 से अधिक उप-समूह मुस्लिम समुदाय से संबंधित थे। 2010 के बाद जोड़ी गई इन सभी जातियों और समुदायों को नई अधिसूचना के तहत सूची से बाहर कर दिया गया है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार आरोप लगाती रही थी कि इन मुस्लिम समुदायों को केवल राजनीतिक लाभ के लिए शामिल किया गया था।
बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा: राजनीतिक और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि आरक्षण का दायरा 17% से घटकर 7% होने और कई जातियों के बाहर होने से बचे हुए ओबीसी समूहों के भीतर सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ जाएगी। साथ ही, भविष्य में सरकार पर पिछड़ेपन के नए वैज्ञानिक आंकड़े जुटाकर एक सुदृढ़ और नया आरक्षण ढांचा तैयार करने का भारी दबाव भी रहेगा।








