CG High Court ने कॉन्स्टेबल पदोन्नति प्रक्रिया पर लगाई फिलहाल रोक

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य में चल रही पुलिस कांस्टेबल भर्ती और पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभाग के भीतर चल रही प्रमोशन की प्रक्रिया (स्क्रूठनी और फिट लिस्ट तैयारी) जारी रह सकती है, लेकिन जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक किसी भी सिपाही का अंतिम पदोन्नति आदेश (प्रमोशन लेटर) जारी नहीं किया जाएगा। यह संवेदनशील मामला माननीय जस्टिस पी.पी. साहू की एकल पीठ (सिंगल बेंच) के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। कोर्ट ने यह अंतरिम राहत 72 से अधिक आरक्षकों द्वारा सामूहिक रूप से दायर की गई याचिकाओं पर विचार करने के बाद दी है। अब इस कानूनी विवाद पर अगली सुनवाई 15 जून 2026 को की जाएगी।

क्या है पूरा विवाद?

प्रदेश के विभिन्न जिलों में इन दिनों आरक्षकों (कांस्टेबलों) को प्रधान आरक्षक (हेड कांस्टेबल) के पद पर प्रमोट करने की विभागीय कार्रवाई चल रही है। इसी प्रक्रिया में सेवा नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कोरबा जिले में तैनात आरक्षक लव कुमार पात्रे, भूपेंद्र कुमार पटेल, विक्रम सिंह शांडिल्य समेत कुल 73 पुलिस जवानों ने हाई कोर्ट की शरण ली है। इस कानूनी लड़ाई में राज्य सरकार, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), बिलासपुर रेंज के आईजी और कोरबा एसपी समेत कई उच्च अधिकारियों को प्रतिवादी (पक्षकार) बनाया गया है।

याचिकाकर्ताओं का मुख्य ऐतराज यह है कि प्रमोशन के लिए तैयार की जा रही वरीयता सूची (सीनियरिटी लिस्ट) में उन पुलिसकर्मियों को भी सीनियर मानकर ऊपर रखा जा रहा है, जिन्होंने कुछ समय पहले अपनी मर्जी (स्वेच्छा) से दूसरे जिलों में अपना ट्रांसफर करवाया था।

सेवा नियमों का दिया गया हवाला

पुलिसकर्मियों की तरफ से अदालत में दलील दी गई कि छत्तीसगढ़ पुलिस एग्जीक्यूटिव फोर्स कांस्टेबल भर्ती, पदोन्नति एवं सेवा शर्त नियम 2007 के संशोधनों के तहत यह साफ नियम है कि:

"यदि कोई भी पुलिसकर्मी अपनी इच्छा से अंतर्जिला स्थानांतरण (म्युचुअल या खुद के खर्च पर ट्रांसफर) लेता है, तो नए जिले में जॉइनिंग के बाद उसकी सीनियरिटी (वरिष्ठता) सबसे शून्य यानी सूची में सबसे नीचे चली जाएगी।"

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस स्पष्ट नियम के बावजूद वर्तमान प्रमोशन प्रक्रिया में उन ट्रांसफर होकर आए कर्मचारियों की मूल नियुक्ति तिथि (पुरानी जॉइनिंग डेट) को आधार मानकर उन्हें गलत तरीके से सीनियरिटी का फायदा दिया जा रहा है।

1 जून को आने वाली थी फाइनल लिस्ट, सरकार ने रखी अपनी बात

अदालत को बताया गया कि यदि हाई कोर्ट इस मामले में तुरंत दखल नहीं देता, तो विभाग द्वारा 1 जून 2026 को अंतिम 'फिट लिस्ट' जारी कर दी जाती। इससे उन स्थानीय आरक्षकों के अधिकारों का हनन होता जो सालों से एक ही जिले में पूरी निष्ठा से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, राज्य सरकार के वकीलों ने दलील दी कि पुलिस मुख्यालय (PHQ) द्वारा इस संबंध में जारी किए गए स्पष्टीकरण पत्र को याचिका में चुनौती नहीं दी गई है। सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि विभाग के पास उपलब्ध वर्तमान रिकॉर्ड के मुताबिक, शिकायत करने वाले कई याचिकाकर्ताओं के नाम खुद भी इस फिट लिस्ट में शामिल होने की पूरी संभावना है।

कोर्ट की टिप्पणी: सेवा नियमों का पालन अनिवार्य

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की जिरह और दस्तावेजों को देखने के बाद प्रथम दृष्टया (पहली नजर में) माना कि यह पूरा विवाद स्थापित सेवा नियमों के सही ढंग से पालन न होने से जुड़ा है। नियमों की पवित्रता बनाए रखने के लिए कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालते हुए अंतरिम निर्देश दिया कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) अपनी जांच और कागजी प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है, मगर जब तक न्यायालय की अंतिम हरी झंडी नहीं मिल जाती, तब तक किसी के भी हक में फाइनल प्रमोशन ऑर्डर जारी नहीं किए जाएंगे।