जयपुर। राजस्थान के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी पारिस देशमुख को राज्य सरकार ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए कार्यमुक्त किया है। वे अब सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी के पद पर सेवाएं देने वाले है। जिसके लिए उनका चयन हुआ था। पांच साल की इस प्रतिनियुक्ति के साथ, देशमुख ने राजस्थान में अपनी प्रभावशाली पारी का समापन किया है। आईपीएस देशमुख अपनी बीती पोस्टिंग में स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) में डीआईजी के तौर पर तैनात थे, जहां उन्होंने राजस्थान को पेपरलीक माफियाओं और नकल गिरोह के चंगुल से निकालने में अहम भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में एसओजी ने कई बड़े पेपरलीक घोटालों, फर्जी डिग्री रैकेट और नकल माफियाओं के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया। इसमें एसआई भर्ती पेपरलीक में बाबू लाल कटारा, कनिष्ठ लिपिकों की भर्ती में पौरव कालेर गिरोह का खुलासा और डमी कैंडिडेट रोशन लाल मीणा की गिरफ्तारी प्रमुख है। देशमुख ने एसओजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर का नवाचार भी किया, जिससे मुन्ना भाईयों को पकड़ने में काफी मदद मिली।
एसओजी से पहले, देशमुख अलवर, चूरू, नागौर, श्रीगंगानगर और सीकर जैसे कई जिलों में एसपी भी रह चुके हैं। उनकी पहचान केवल बौद्धिक क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी जांबाजी के किस्से भी मशहूर हैं। कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर के बाद नागौर के सांवराद में जनआक्रोश के दौरान उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर साथी पुलिसकर्मियों को भीड़ से सुरक्षित निकाला था, जिसमें वे खुद भी घायल हुए थे। इसके अलावा, 2013 में अलवर में मेवाती गैंग के साथ हुए एनकाउंटर में भी वे गोली के छर्रे लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और अपनी टीम के साथ दो बदमाशों को गिरफ्तार किया।
मूल रूप से महाराष्ट्र के गोंदिया निवासी पारिस देशमुख 2010 बैच के राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। वे तकनीकी शिक्षा में माहिर हैं और सिविल सर्विसेज में आने से पहले एनआईआईटी में सॉफ्टवेयर ट्रेनर के रूप में एनडीए कैडेट्स को कंप्यूटर प्रशिक्षण दे चुके थे। उन्होंने महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है।









