मौसम का रौद्र रूप: अल नीनो और भीषण लू की दोहरी मार, 30 हजार से ज्यादा मौतों की गंभीर चेतावनी

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नई दिल्ली | जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच भारत में दस्तक दे रही भीषण गर्मी को लेकर एक नए वैज्ञानिक शोध ने बेहद डरावनी चेतावनी जारी की है। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में अत्यधिक तपिश वाले सिर्फ एक दिन के कारण करीब 3,400 अतिरिक्त लोगों की असमय जान जा सकती है। वहीं, यदि यह जानलेवा हीटवेव लगातार पांच दिनों तक खिंच जाती है, तो देश भर में मौतों का यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 30 हजार के खौफनाक स्तर को छू सकता है। 'फ्रंटियर्स इन एनवायरनमेंटल हेल्थ' नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश को सबसे संवेदनशील और प्रभावित राज्य बताया गया है।

शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल कर रही गर्मी, उत्तर प्रदेश पर सबसे बड़ा खतरा

चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार, वातावरण का पारा अत्यधिक बढ़ने से मानव शरीर की आंतरिक तापमान को नियंत्रित करने की प्राकृतिक क्षमता पूरी तरह ठप हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप लोगों में सनस्ट्रोक, शरीर में पानी की गंभीर कमी (निर्जलीकरण), दिल के दौरे और सांस से जुड़ी जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों के विश्लेषण से पता चलता है कि लगातार पांच दिनों तक चलने वाली लू उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत के लिए काल बन सकती है, जहां वर्तमान में राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा के कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है। शोध के अनुमानों के मुताबिक, पांच दिन की लगातार हीटवेव के दौरान अकेले उत्तर प्रदेश में ही करीब 8,100 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इसके अलावा बड़ी आबादी और सीमित स्वास्थ्य ढांचे के कारण बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भी बड़े पैमाने पर जनहानि का अंदेशा जताया गया है।

कंक्रीट के जंगल बने महानगर, 'अर्बन हीट आइलैंड' से बढ़ा रात का तापमान

यह अध्ययन ग्रामीण अंचलों के साथ-साथ देश के प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक शहरों के प्रति भी गंभीर चिंता व्यक्त करता है। रिपोर्ट में अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे बड़े शहरों का विशेष तौर पर जिक्र किया गया है, जहां लू के एक ही दौर में 250 से अधिक अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है। विशेषज्ञों ने इसके पीछे अनियंत्रित शहरीकरण को मुख्य वजह माना है। शहरों में कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें, डामर (तारकोल) से बनी सड़कें और हरियाली की कमी सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं और उसे वातावरण में ही रोके रखती हैं। इस वैज्ञानिक प्रभाव को 'अर्बन हीट आइलैंड' कहा जाता है। इसकी वजह से शहर अपने आस-पास के देहाती क्षेत्रों के मुकाबले कहीं अधिक तपते हैं, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि यहां रात के समय भी पर्यावरण को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता, जिससे नागरिकों का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है।

अल नीनो का दोहरा प्रहार: 11 वर्षों में सबसे कम मानसूनी बारिश के आसार

एक तरफ जहां देश भीषण तपन की मार झेल रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रहे 'अल नीनो' के प्रभाव के कारण इस साल भारत में पिछले 11 वर्षों की सबसे कमजोर मानसूनी बारिश का अनुमान लगाया गया है। जून से सितंबर तक होने वाला मानसून भारतीय उपमहाद्वीप के लिए जीवनरेखा माना जाता है, क्योंकि देश की 70 प्रतिशत सालाना वर्षा इसी दौरान होती है, जो जलस्रोतों को भरने और खेती को सींचने का काम करती है। लगभग 381.8 लाख करोड़ रुपये ($4 Trillion) की भारतीय अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा सीधे तौर पर कृषि और वर्षा पर टिका हुआ है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर चल रहे युद्धों के कारण देश पहले ही महंगाई के दबाव में है, ऐसे में जुलाई और अगस्त के मुख्य महीनों में कम बारिश होने से अनाज, दालें, कपास, तिलहन और मक्का जैसी फसलों की बुवाई बुरी तरह प्रभावित होगी। हालांकि देश के पास खाद्यान्न का पर्याप्त आपातकालीन स्टॉक मौजूद है, लेकिन ग्रामीण भारत की दो-तिहाई आबादी की आय घटने से देश की विकास दर सुस्त पड़ सकती है और कुल खुदरा महंगाई बढ़कर 5.5 फीसदी के पार पहुंच सकती है।